Home उत्तराखंड पसीने से सींची खाल-खंतीया, अब पानी से लबालब

पसीने से सींची खाल-खंतीया, अब पानी से लबालब

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शंकर सिंह बिष्ट

“आंखें नम हैं और मन में अपार खुशी है।”
ये शब्द सिर्फ भाव नहीं हैं। ये उन महीनों की मेहनत का प्रमाण हैं जो आज बारिश की पहली बूंद के साथ सार्थक हो गई।

महत गांव, भटकोट, झूमाखेत, गैरसैंण, हाट, बासभिडा, कौसानी, चनौला आदि अनेक क्षेत्रों में युवा साथियों, मातृशक्ति और ग्राम प्रधान के नेतृत्व में जल संरक्षण के लिए बनाई गईं खाल-खंतीया मानसून आते ही लबालब भर गई हैं। पहाड़ से उतरता पानी अब बेकार बहकर नहीं जा रहा। वह इन संरचनाओं में थमकर धीरे-धीरे धरती की गोद में समा रहा है।

अनुमान है कि आने वाले वर्षों में इससे लाखों लीटर पानी संरक्षित होगा। और सबसे बड़ी बात – यह पानी सीधे भूजल में जाएगा। सूखते सोतों को, मुरझाते खेतों को और प्यासे भविष्य को जीवन देगा।

संकट के बीच उम्मीद की किरण

उत्तराखंड आज दोहरे संकट से गुजर रहा है। एक ओर जलवायु परिवर्तन से मानसून अनियमित हुआ है, दूसरी ओर पलायन के कारण गांव खाली हो रहे हैं। सरकारी योजनाएं अपनी जगह हैं, लेकिन धरातल पर बदलाव तब आता है जब समाज खुद मैदान में उतरता है।

ग्रामीणों ने वही किया। यहां न कोई बड़ा फंड आया, न कोई मशीन लगी। लगा तो सिर्फ जज्बा। युवाओं का श्रम, महिलाओं का सहयोग और ग्राम प्रधान का दूरदर्शी नेतृत्व। तन, मन और धन से जुड़े हर व्यक्ति ने मिलकर साबित कर दिया कि इच्छाशक्ति हो तो सबसे बड़ा संसाधन इंसान ही है।

राज्य के लिए नसीहत : अब हर गांव को महत बनना होगा

  1. पानी को रोकना सीखें
    बरसात का पानी बहने देना सबसे बड़ी भूल है। हर गांव, हर टोले में खाल-खंती, चेकडैम और नौलों का पुनर्जीवन जरूरी है।
  2. पारंपरिक ज्ञान ही आधुनिक समाधान है
    हमारे पूर्वज बिना इंजीनियर के पानी बचाते थे। उस ज्ञान को तकनीक के साथ जोड़ना होगा।
  3. युवा और मातृशक्ति को आगे लाएं
    ग्रामीणों ने दिखाया कि जब युवा और महिलाएं कमान संभालती हैं तो असंभव भी संभव हो जाता है। पलायन रोकने का रास्ता भी यहीं से निकलेगा।
  4. एक खंती + एक पेड़
    जल संरक्षण के साथ वृक्षारोपण को जोड़ें। पेड़ होंगे तो मिट्टी रुकेगी, पानी रुकेगा और जीवन बचेगा।

इस मुहिम से जुड़े हर सहयोगी और हर उस व्यक्ति को दिल से धन्यवाद जिसने मनोबल बढ़ाया। आप सबकी वजह से आज हमें उस काम से संतुष्टि मिल रही है जो आने वाली पीढ़ियों के काम आएगा।

महत गांव, भटकोट, झूमाखेत, गैरसैंण, हाट, बासभिडा, कौसानी, चनौला आदि अनेक क्षेत्रों की ये खाल-खंतीया सिर्फ गड्ढे नहीं हैं। ये पहाड़ के भविष्य की नींव हैं। काश, उत्तराखंड का हर गांव आज इन गावों से प्रेरणा ले।

“क्योंकि जिस दिन पहाड़ का पानी बच गया, उस दिन पहाड़ भी बच जाएगा।”

मानसून की पहली बारिश में महत गांव की खाल-खंतीया लबालब। ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से लाखों लीटर पानी हुआ संरक्षित।