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राष्ट्रीय परिसंपत्ति मौद्रीकरण पाइपलाइन नीति

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(आलेख : स्वदेश देव रॉय, अनुवाद : संजय पराते)

राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन निस्संदेह एक पूरी तरह से राष्ट्र-विरोधी नीति है, जिसे मोदी सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे अधिक व्यावसायिक रूप से लाभदायक परिसंपत्तियों को, मोदी की पसंद के बड़े निजी व्यापारिक घरानों को सौंपने के लिए घोषित किया है। यह हस्तांतरण एक संदिग्ध तंत्र के माध्यम से किया जाएगा, जिसे किसी और ने नहीं, बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र के विध्वंसक नीति आयोग ने तैयार किया है। राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन- 02 को मोदी सरकार की संशोधित सार्वजनिक नीति को साकार करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

हालाँकि सरकार द्वारा भ्रामक प्रचार किया जा रहा है और पूँजीपति वर्ग के कलमघिस्सुओं द्वारा ‘राष्ट्रीय परिसंपत्ति मौद्रीकरण पाइपलाइन’ (एनएमपी) के आर्थिक लाभों के बारे में कपटपूर्ण बातें कही जा रही हैं, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि एनएमपी बड़े निजी कॉर्पोरेटों, चाहे वे घरेलू हों या विदेशी के लिए एक तोहफ़ा है। यह उन्हें बिना किसी निवेश के और बिना किसी प्रतीक्षा के, तत्काल मुनाफ़ा कमाने की सुविधा प्रदान करता है। जिन सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, वे मूल और रणनीतिक प्रकृति की हैं। इनका भौतिक और वित्तीय प्रदर्शन लगातार बेहतर रहा है, और इनके लिए बाज़ार भी पूरी तरह से सुनिश्चित है।

केंद्रीय बजट 2025-26

केंद्रीय बजट 2025-26 में एनएमपी 2.0 को शुरू करने की घोषणा की गई है। इसमें कहा गया है कि 2021 में घोषित पहली परिसंपत्ति मौद्रीकरण योजना की सफलता को आगे बढ़ाते हुए, दूसरी योजना को समर्थन देने के लिए नियामक और राजकोषीय उपायों को और बेहतर बनाया जाएगा। एमएनपी 2.0 का लक्ष्य वित्तीय वर्ष 2026 से 2030 के दौरान परिसंपत्तियों के मौद्रीकरण  से 16.72 लाख करोड़ रुपये जुटाना है। एनएमपी-02 के क्रियान्वयन के लिए एक विस्तृत ब्लूप्रिंट और रोडमैप नीति आयोग द्वारा पहले ही तैयार और प्रकाशित किया जा चुका है।

आयोग के अनुसार, एनएमपी 1.0 ने अपने लक्ष्य का 89% हिस्सा हासिल किया है, जो कि 5.3 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। इस पूंजी का सबसे बड़ा हिस्सा, अधिक मुनाफ़ा कमाने वाली संपत्तियों को निजी क्षेत्र को आउटसोर्स करके जुटाया गया है।

एनएमपी-01 की तरह ही, एनएमपी 2.0 भी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र इकाईयों की संपत्तियों के हस्तांतरण, उनके हिस्से की बिक्री, सुरक्षित नकद प्रवाह या रणनीतिक व्यावसायिक नीलामी के ज़रिए संपत्ति के मौद्रीकरण का सहारा लेगा। एनएमपी-02 के तहत पहचाने गए क्षेत्रों में हाईवे, कोयला खदानें, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस पाइपलाइन, बंदरगाह और दूरसंचार शामिल हैं। सरकार का दिवालियापन और हताशा इस चौंकाने वाले तथ्य से उजागर होता है कि एनएमपी-2.0 का ध्यान केवल मुख्य संपत्तियों पर ही होगा। विभिन्न मुख्य संपत्तियों में से, उन संपत्तियों पर ध्यान दिया जाएगा, जो वर्तमान में राजस्व कमा रही हैं या जिनकी सुविधाएं काफी हद तक पूरी हो चुकी हैं और जिन्हें उचित रूप से बढ़ाया जाएगा। इसलिए, एनएमपी-01 की तरह ही, इस बार भी बेहतरीन ढंग से संचालित और मुनाफ़ा कमाने वाली सार्वजनिक इकाईयों को ही निशाना बनाया गया है।

सकल राजस्व, शुद्ध लाभ और राजकोष में योगदान

वित्त वर्ष 2023-24 की तुलना में, वित्त वर्ष 2024-25 में सकल राजस्व 36.08 लाख करोड़ रूपये से बढ़कर 37.01 लाख करोड़ रूपये हो गया। कार्यरत केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों का शुद्ध लाभ लगातार बढ़ रहा है। पाँच वर्षों की अवधि (वित्त वर्ष 2020-21 से वित्त वर्ष 2024-25 तक) के दौरान, शुद्ध लाभ 1.66 लाख करोड़ रूपये से बढ़कर 2.91 लाख करोड़ रूपये हो गया है।

सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों द्वारा केंद्रीय खजाने में किए जा रहे लगातार बढ़ते और टिकाऊ योगदान को देखते हुए, सरकार की बिना सोचे-समझे अपनाई गई विनिवेश नीति पूरी तरह से आत्मघाती है। ये इकाईयां उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क, जीएसटी, कॉर्पोरेट टैक्स, केंद्र सरकार के कर्ज़ पर ब्याज, लाभांश और अन्य शुल्कों व करों के रूप में सरकार को भारी मात्रा में पूंजी का भुगतान करते रहे हैं। ‘सार्वजनिक उद्यम सर्वेक्षण 2024-25’ के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में इनका कुल योगदान 24.03 लाख करोड़ रूपये रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में, इन इकाईयों ने केंद्रीय खजाने में 4.94 लाख करोड़ रुपयों का योगदान दिया है।

केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा 2024-25 के लिए किए गए सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम सर्वे में सरकार ने खुद यह माना है कि, “केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व में अपना योगदान देने में अहम भूमिका निभाते हैं। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत आने वाली गतिविधियों में शामिल हैं। भूख और गरीबी मिटाना, स्वास्थ्य सेवा और स्वच्छता, ग्रामीण विकास, शिक्षा और कौशल विकास, केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए फंड में योगदान, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण की रक्षा, महिलाओं और अन्य आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों का सशक्तिकरण, खेल, कला और संस्कृति, सशस्त्र बलों का कल्याण आदि। पिछले 5 सालों में, इन उपक्रमों  ने सीएसआर में कुल मिलाकर 24,520 करोड़ रुपयों का योगदान दिया है।”

आज जब भारतीय रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है, तो यह कहना बेहद महत्वपूर्ण है कि ये सार्वजनिक उपक्रम बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करने में योगदान दे रहे हैं। पिछले 5 वर्षों के दौरान इन उपक्रमों ने कुल मिलाकर 6.95 लाख करोड़ रुपयों की राशि अर्जित की है। अकेले वित्त वर्ष 2024-25 में ही, इन्होंने विदेशी मुद्राओं में 1.57 लाख करोड़ रूपये कमाए।

सार्वजनिक क्षेत्र के संबंध आत्मघाती नीतियों का पर्दाफ़ाश करो!

सरकार द्वारा शुरू की गई ‘नई सार्वजनिक क्षेत्र नीति’ , असल में नरेंद्र मोदी की उस कुख्यात घोषणा को लागू करने की कार्ययोजना है, जो उन्होंने चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए की थी। “सार्वजनिक क्षेत्र तो मरने के लिए ही पैदा हुआ है।” ज़ाहिर है, ऐसी नीतियाँ व्यवस्थागत संकट से गहराई से जुड़ी हुई हैं, और यह पूँजीवाद के उस एकाधिकारवादी चरण का ही एक परिणाम हैं, जिस पर सत्ताधारी वर्ग के चहेते पूँजीपतियों का वर्चस्व है।

यह आक्रामक नव-उदारवादी सरकार राष्ट्रीय संपत्तियों की लूट-खसोट की नीति को पूरी ज़ोर-शोर से, और वह भी बिना किसी रोक-टोक के, आगे बढ़ा रही है, जो उसकी वैचारिक और वर्गीय हताशा को दर्शाती है। सत्ता में काबिज़ दक्षिणपंथी पार्टी की विभाजनकारी चालों ने उन लोगों की चेतना को ही सुस्त कर दिया है, जिन्होंने इन संपत्तियों का निर्माण किया है और जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे ऐसी राष्ट्र-विरोधी नीतियों को हराने के लिए निर्णायक संघर्ष करेंगे। जिस तरह हमें अपने देश के प्रगतिशील इतिहास को याद रखना चाहिए और उसकी रक्षा करनी चाहिए, ठीक उसी तरह हमें आज़ादी के बाद भारत के आर्थिक पुनर्निर्माण में सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा निभाई गई भूमिका को भी याद रखना चाहिए और सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों की रक्षा के लिए संघर्ष करना होगा।

(लेखक सीटू के राष्ट्रीय सचिव हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)