Home समसामयिक नई विनिवेश नीति : केंद्रीय उद्यमों की 74% हिस्सेदारी बेचने की साजिश

नई विनिवेश नीति : केंद्रीय उद्यमों की 74% हिस्सेदारी बेचने की साजिश

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(आलेख : स्वदेश देव रॉय, अनुवाद : संजय पराते)

केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों पर हो रहे विनाशकारी हमलों के इस मौजूदा दौर में, हमें केंद्र की मौजूदा राजग सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र को नीचा दिखाने वाली नीति के पीछे के आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक पहलुओं को स्पष्ट रूप से समझना होगा।

पूंजीवाद का व्यवस्थागत संकट

निजीकरण के इस आक्रामक अभियान के आर्थिक पहलू को, पूंजीवाद के उस लगातार गहराते जा रहे व्यवस्थागत संकट के परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए, जिसने पूरे पूंजीवादी विश्व को अपनी जकड़ में ले लिया है। हमेशा की तरह, मौजूदा आर्थिक संकट में भी, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ही सरकार के सबसे आसान शिकार हैं, ताकि संकट से निपटने के लिए संसाधन जुटाए जा सकें। आर्थिक संकट को कम करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों को बेच देने की इस कवायद को बिल्कुल सही ही यह नाम दिया गया है कि “नौकर का वेतन चुकाने के लिए घर के कीमती बर्तन बेच देना।”

निजीकरण की विनाशकारी मुहिम के पीछे के राजनीतिक और वैचारिक पहलुओं की स्पष्ट अभिव्यक्ति राजीव कुमार के शब्दों में मिलती है, जो नीति आयोग के उपाध्यक्ष थे। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों में सरकारी हिस्सेदारी बेचना, केवल राजस्व जुटाने का एक माध्यम भर नहीं है, यह निजी क्षेत्र को अधिक जगह और अवसर देने का भी एक माध्यम है। अब सबसे बड़ा बदलाव यह है कि सर्वोच्च स्तर पर मौजूद राजनीतिक नेतृत्व (यानी प्रधानमंत्री) ने भी यह स्पष्ट कर दिया है।

इसके अलावा, इस राजनीतिक मिशन का उद्देश्य निजी पूंजी चाहे वह विदेशी हो या घरेलू को यह संकेत देना है कि मोदी सरकार निजी पूंजी के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना है, और सार्वजनिक क्षेत्र के प्रति उसकी नीति ‘शून्य सहनशीलता’ की है। यही नहीं, यह सरकार स्पष्ट रूप से नव-उदारवाद के सिद्धांत के प्रति समर्पित है, जो सार्वजनिक क्षेत्र के किसी भी अवशेष के भी सख्त खिलाफ है। इसके साथ ही, इसका मकसद यह प्रदर्शित करना है कि मोदी सरकार पूरी तरह से निजी क्षेत्र के लिए समर्पित है और निष्कर्षतः सार्वजनिक क्षेत्र के विरुद्ध है।

नरेंद्र मोदी द्वारा योजना आयोग को समाप्त करना और उसकी जगह कुख्यात ‘नीति आयोग’ का गठन करना भी नव-उदारवादी विचारधारा से ही प्रेरित है। ऐसे अकाट्य तथ्य और आँकड़े मौजूद हैं, जो यह दर्शाते हैं कि 1951 से लेकर अब तक भारत में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की योजना बनाने, उन्हें वित्त पोषित करने और उनके निर्माण में विशेषकर बुनियादी रणनीतिक क्षेत्रों में योजना आयोग ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

‘गई गुजरी नई विनिवेश नीति’

वर्तमान सरकार का यह हताश इरादा है कि वह केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का पूरी तरह से निजीकरण कर देगी। यह ‘नई सार्वजनिक क्षेत्र नीति’ दस्तावेज़ के इस उद्धरण से बिल्कुल स्पष्ट है, रणनीतिक क्षेत्र/गैर-रणनीतिक क्षेत्र में आने वाले केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का निजीकरण किया जाएगा, विलय किया जाएगा, उन्हें किसी अन्य केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम के साथ मिला दिया जाएगा, उनकी सहायक कंपनियाँ बनाई जाएँगी या उन्हें बंद कर दिया जाएगा। उपर्युक्त रणनीतिक क्षेत्र में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की उपस्थिति केवल नाम मात्र की ही रखी जाएगी।

केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों के 74% शेयर निजी व्यवसायों को बेचने के उद्देश्य से, वित्त मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत 2025-26 के ‘आर्थिक सर्वेक्षण’ में इस राष्ट्र-विरोधी ‘निजीकरण परियोजना’ को आगे बढ़ाने के लिए कई विनाशकारी कदम सुझाए गए हैं। सरकार कंपनी अधिनियम में संशोधन करेगी, जिसके तहत केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की 74% हिस्सेदारी बेचने के बाद भी, यदि उनके पास केवल 26% हिस्सेदारी बचती है, तो भी उन्हें ‘सरकारी कंपनी’ के रूप में ही परिभाषित किया जा सकेगा। अधिनियम के मौजूदा प्रावधान के अनुसार, कोई भी फर्म तभी ‘सरकारी कंपनी’ मानी जाती है, जब उसकी कम से कम 51% हिस्सेदारी सरकार के पास हो। यह सरकार की हताशा को दर्शाता है, यह देश की जनता को धोखा देने की कोशिश है, और साथ ही खुद को भी भ्रम में रखने जैसा है। यहाँ तक कि एक मूर्ख भी यह जानता है कि किसी भी कंपनी में सबसे ज़्यादा इक्विटी रखने वाला ही उसका असली मालिक होता है।

12-13 फरवरी, 2026 को, भाजपा सांसद भर्तृहरि महताब की अध्यक्षता वाली एक संसदीय स्थायी समिति ने सरकार से नई सार्वजनिक क्षेत्र नीति के क्रियान्वयन में तेज़ी लाने का आग्रह किया है। समिति ने कथित तौर पर कहा है कि इस नई नीति को राजकोषीय अनुशासन की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। लेकिन साथ ही यह भी टिप्पणी की कि इसके ठोस परिणाम अभी तक सुस्त रहे हैं। इसलिए, नीतिगत लक्ष्यों और उनके क्रियान्वयन के बीच के अंतर को पाटने के लिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है!

इस बीच, पूरे देश में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र इकाईयों की विशाल ज़मीन-जायदाद से पैसा कमाने के लिए, सरकार ने पहले ही एक खास ज़मीन-हथियाने वाली संस्था बना दी है, जिसका नाम है ‘नेशनल लैंड मोनेटाइजेशन कॉर्पोरेशन’ (एनएलएमसी)। ज़ाहिर है कि केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र इकाईयों की सबसे कीमती जमीन राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन-02 का मुख्य निशाना होगी। राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन-02 के लिए चुने गए पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइज़ में हाईवे, रेलवे, सिविल एविएशन, बंदरगाह, पेट्रोलियम, बिजली, कोयला खदानें, दूसरी खदानें, टेलीकॉम और पर्यटन आदि शामिल हैं।

इस संशोधित सार्वजनिक क्षेत्र नीति के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के 74% शेयर बेचने का मोदी सरकार का फ़ैसला, देश में सार्वजनिक क्षेत्र के अस्तित्व को पूरी तरह से समाप्त कर देगा। और निजीकरण की इस परियोजना को साकार करने के लिए राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन-02 के तहत तैयार किया गया रोडमैप, घरेलू और विदेशी दोनों ही तरह के निजी व्यापारिक दिग्गजों के लिए एक बड़ा फ़ायदा साबित होगा।

(लेखक सीटू के राष्ट्रीय सचिव हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)