उत्तराखंड में मंत्री पदों की बंदरबांट से कार्यकर्ता नाराज
देहरादून । उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य सरकार द्वारा किए गए कैबिनेट विस्तार और राज्यमंत्री व दर्जा प्राप्त पदों की नियुक्तियों ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इन नियुक्तियों से भाजपा का जमीनी कार्यकर्ता खुद को हाशिए पर महसूस कर रहा है।
पार्टी के अंदर से मिल रही प्रतिक्रियाओं के अनुसार, राज्यमंत्री, दर्जा मंत्री और संगठन पदाधिकारियों को तरजीह मिलने से कार्यकर्ताओं में निराशा देखी जा रही है। उनका मानना है कि चुनाव के समय किए गए विस्तार से संगठन के बजाय पदधारियों को ही लाभ पहुंचा है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने 2022 चुनाव में खटीमा से मिली हार के बाद सुरक्षित सीट की तलाश बड़ी चुनौती बनी हुई है। चम्पावत से उपचुनाव जीतकर वह सदन में पहुंचे थे, लेकिन अब वहां फिर से चुनाव लड़ने को लेकर अटकलें तेज हैं। इसके अलावा खटीमा और डीडीहाट का नाम भी चर्चा में है।

इस बीच कालाढूंगी विधानसभा को लेकर नया मोड़ आया है। क्षेत्र के वरिष्ठ भाजपा विधायक बंशीधर भगत ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि “कालाढूंगी विधानसभा भगत परिवार की सीट है”। राजनीतिक जानकार इसे धामी को अप्रत्यक्ष निमंत्रण के रूप में देख रहे हैं, लेकिन साथ ही यह भी मानते हैं कि इसके राजनीतिक निहितार्थ भी होंगे। वैसे भी कालाढूंगी को भाजपा के लिए पारंपरिक रूप से सुरक्षित सीट माना जाता है। इसके पीछे क्षेत्र में भाजपा के बड़े नेताओं की मौजूदगी और कार्यकर्ताओं का मजबूत नेटवर्क बताया जाता है। स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं की संख्या भी अधिक है, जिसके कारण यह सीट भाजपा के लिए लगातार अनुकूल रही है।
उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए “किस सीट से लड़ें” सबसे बड़ा सियासी सवाल बन गया है। पार्टी ने साफ किया है कि चुनाव धामी के चेहरे पर लड़ा जाएगा, लेकिन वो किस विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतरेंगे, इस पर अभी फैसला नहीं हुआ है। बुद्धिजीवी वर्ग का तर्क है कि अगर धामी ने 2022 के बाद खटिमा में जनता के साथ रहकर विकास कार्यों को गति दी होती, तो 2027 के लिए सुरक्षित सीट ढूंढने की नौबत ही न आती। 2022 में धामी खटिमा से चुनाव हार गए थे, जिसके बाद उन्हें चंपावत उपचुनाव लड़कर विधायक बनना पड़ा था।
भाजपा नेतृत्व का कहना है कि अंतिम फैसला चुनाव करीब आने पर फीडबैक और समीकरणों को देखते हुए लिया जाएगा। फिलहाल धामी के सामने चुनौती यह है कि रिस्क लेकर खटिमा से मैदान में उतरें या सुरक्षित विकल्प चुनकर विपक्ष को “सीट बदलने” का मुद्दा थमा दें। फिलहाल मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से सीट को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। आने वाले दिनों में उम्मीदवारों की सूची तय होने के बाद तस्वीर स्पष्ट होने की उम्मीद है।





























