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लेखक गाँव की साहित्यिक यात्रा

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स्मृतियों में अंकित एक अविस्मरणीय अध्याय

ललिता कापड़ी, हल्द्वानी उत्तराखंड

कभी-कभी जीवन हमें ऐसे अवसर प्रदान करता है जो केवल यात्राएँ नहीं होते, बल्कि संवेदनाओं, संबंधों और साहित्यिक संस्कारों के उत्सव बन जाते हैं। अपने निजी आवश्यक कार्यों से आदरणीया स्मिता शाह जी के साथ देहरादून जाने का अवसर मिला। इस यात्रा का सबसे सुंदर और अविस्मरणीय पड़ाव रहा — लेखक गाँव।

लेखक गाँव के विषय में बहुत पहले से सुन रखा था। मन में वहाँ जाने की एक गहरी इच्छा थी। वह इच्छा जब साकार हुई तो उसके पीछे सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही प्रिय साहित्यकार शशि कुड़ियाल जी की । उनके स्नेह, आत्मीयता और अथक प्रयासों के कारण ही हम लेखक गाँव पहुँच सके। उनके द्वारा की गई उत्कृष्ट व्यवस्थाएँ, आत्मीय आतिथ्य और हमारे लिए निकाला गया बहुमूल्य समय सदैव स्मरणीय रहेगा। इसके लिए हम उनके तथा आदरणीय के.सी. कुड़ियाल जी एवं अनंत कुड़ियाल जी के प्रति हृदय से कृतज्ञ हैं।

इस यात्रा की सबसे विशेष उपलब्धि यह रही कि पितृ दिवस के पावन अवसर पर लेखक गाँव की पुण्यभूमि पर सम्पर्क संस्थान के बैनर तले एक सूक्ष्म किंतु अत्यंत सार्थक काव्य गोष्ठी का आयोजन सम्पन्न हुआ। यह हमारे लिए गर्व और संतोष का विषय था कि हम साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय सम्पर्क संस्थान का परिचय लेखक गाँव जैसे प्रतिष्ठित साहित्यिक केन्द्र से करा सके।

इस अवसर पर सुप्रसिद्ध साहित्यविद् आदरणीय राजीव नयन बहुगुणा जी की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष ऊँचाई प्रदान की। उनसे मिलना अपने आप में एक यादगार अनुभव रहा। हृदय तब और अधिक गौरव से भर उठा जब उन्होंने आदरणीय अनिल लढ़ा जी का नाम सुनते ही अत्यंत आत्मीयता से कहा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्हें उनके साथ कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ है। उस क्षण उनके चेहरे पर उभरी प्रसन्नता और सम्मान की चमक ने हम सभी को यह अनुभव कराया कि व्यक्ति के श्रेष्ठ कर्म और सामाजिक योगदान ही उसकी वास्तविक पहचान बनते हैं।

कार्यक्रम में नीतू डिमरी जी, गीता जुयाल जी, नन्हीं प्रतिभाशाली विदुषी डिमरी तथा प्रतीति शाह की उपस्थिति ने इस साहित्यिक संगोष्ठी को और अधिक जीवंत एवं पारिवारिक स्वरूप प्रदान किया। यह केवल कविताओं का आयोजन नहीं था, बल्कि पीढ़ियों के बीच साहित्यिक संस्कारों के हस्तांतरण का एक सुंदर दृश्य भी था।

लेखक गाँव की यह यात्रा हमें यह संदेश देकर लौटी कि साहित्य केवल पुस्तकों के पन्नों में नहीं बसता, वह मनुष्यों के बीच बने आत्मीय संबंधों, संवादों और साझा संवेदनाओं में भी जीवित रहता है। जब साहित्यकार, समाजसेवी, शिक्षाविद् और नई पीढ़ी एक साथ बैठकर विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, तब समाज में सकारात्मक परिवर्तन की नई संभावनाएँ जन्म लेती हैं।

ऐसे अवसर हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि शब्दों की शक्ति आज भी मनुष्यता को जोड़ने, संस्कारों को संजोने और समाज को दिशा देने में सक्षम है। लेखक गाँव की यह स्मृति केवल एक यात्रा की स्मृति नहीं, बल्कि साहित्य, मित्रता, सम्मान और मानवीय मूल्यों के उत्सव की अमिट स्मृति है, जो सदैव हृदय में प्रकाशित रहेगी।