‘जय पहाड़, जय पहाड़ी’ का बुलंद नारा
हल्द्वानी। उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) ने राज्य गठन के 25 साल बाद भी जनता के मुद्दों को लेकर भाजपा-कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। पार्टी का कहना है कि भले ही उनके पास राष्ट्रीय दलों जितने धन-संसाधन न हों, लेकिन पहाड़, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर उनके हौंसले बुलंद हैं। यूकेडी ने आरोप लगाया कि पिछले 25 वर्षों में भाजपा और कांग्रेस की सत्ता में पहाड़ वीरान, खंडहर और भूतिया नजर आने लगे हैं। पार्टी के अनुसार, सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की अनदेखी और निजीकरण के चलते स्थानीय लोगों को पहले रोजगार और अब बच्चों की बेहतर पढ़ाई-इलाज के लिए पलायन करना पड़ रहा है।

यूकेडी का यह भी कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों पर बड़े नेताओं का कब्जा है और सरकारी संस्थानों को धीरे-धीरे निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, जिसका मकसद पार्टी फंड जुटाना है। पार्टी ने मौजूदा धामी सरकार पर राज्य को अनावश्यक कर्ज के बोझ तले दबाने का भी आरोप लगाया।
2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए यूकेडी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भ्रष्टाचार, पलायन, भू-कानून, बिगड़ती कानून व्यवस्था, दिन प्रतिदिन बढ़ते महिला अपराध और जल-जंगल-जमीन जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी कार्यकर्ता इन दिनों गांव-गांव जाकर लोगों को उनके अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक कर रहे हैं। यूकेडी का नारा है “जय पहाड़, जय पहाड़ी”, जिसका मतलब है धर्म, जाति और क्षेत्र से ऊपर उठकर सिर्फ उत्तराखंड के विकास की बात। पार्टी ने कहा कि जनता उनके इस संघर्ष में कितना साथ देती है, यह 2027 के चुनाव परिणाम ही तय करेंगे।
यूकेडी में लौट रहे युवा, विदेशी नौकरियां छोड़ पहाड़ के लिए खड़े हुए

उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) का दावा है कि इन दिनों पार्टी में युवा वर्ग की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। यूकेडी के अनुसार, कई युवा करोड़ों की विदेशी नौकरियां छोड़कर सिर्फ उत्तराखंड के विकास की चिंता में पार्टी से जुड़ रहे हैं। पार्टी ने राज्य में बढ़ते महिला अपराध और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर न जुटा पाने को भाजपा-कांग्रेस के 25 साल के शासन पर “तमाचा” बताया है। यूकेडी का आरोप है कि सरकार स्थानीय लोगों की उपेक्षा कर अन्य प्रदेशों के लोगों को सरकारी कार्यों में पहली प्राथमिकता दे रही है, जिससे राज्य में बेरोजगारी और बढ़ रही है। शहरी इलाकों की तुलना में ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों पर कम धन खर्च करने का भी आरोप लगाया गया है। यूकेडी के मुताबिक, सरकारी शिक्षण संस्थान धीरे-धीरे बंद हो रहे हैं, जबकि विकास के नाम पर पंचायत भवनों के निर्माण पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि इन भवनों के निर्माण का ठेका भी राष्ट्रीय दलों के कार्यकर्ताओं को ही मिल रहा है, और इन भवनों के बनने के 1-2 साल बाद ही वे क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। पार्टी का कहना है कि इन्हीं मुद्दों को लेकर उत्तराखंड के अधिकांश युवा अब मैदान में उतर रहे हैं।
तो क्या तमिलनाडु की तर्ज पर उत्तराखंड में भी होगा परिवर्तन
सीमित संसाधनों के बावजूद उत्तराखंड क्रांति दल ने 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी को लेकर जमीन पर सक्रियता बढ़ाई है। केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती ने साफ कहा है कि यूकेडी 2027 में राज्य की सभी 70 विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगा। इसके लिए ‘एक बूथ, दस युवा’ नारा दिया गया है। पिथौरागढ़, घनसाली, हरिद्वार, विकासनगर, बागेश्वर जैसे जिलों में नए कार्यालय खुल रहे हैं, सदस्यता अभियान चल रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में सैकड़ों नए कार्यकर्ता पार्टी से जुड़े हैं। यूकेडी लगातार मूल निवास, सशक्त भू-कानून, गैरसैंण को स्थायी राजधानी, पलायन, बेरोजगारी, भर्ती घोटालों और अंकिता भंडारी केस जैसे मुद्दों को उठा रहा है। पार्टी का तर्क है कि बीजेपी और कांग्रेस ने 25 साल में राज्य निर्माण के सपनों को पूरा नहीं किया। बहरहाल यूकेडी राष्ट्रीय दलों के मुकाबले धनबल में कमजोर रहा है। लेकिन पार्टी इसे कार्यकर्ताओं की सक्रियता और ‘युवा शक्ति’ से भरपाई करने की कोशिश कर रही है। केंद्रीय संरक्षक सुरेंद्र कुकरेती ने युवाओं को सीधे राज्य की अस्मिता और अधिकारों की रक्षा में लगने की अपील की है। जिस तरह तमिलनाडु में क्षेत्रीय दलों का दबदबा ऐतिहासिक रहा है। उत्तराखंड में 2000 में राज्य बनने के बाद भी यूकेडी मुख्यधारा में नहीं टिक पाया। लेकिन 2024-25 में जिस तरह सदस्यता अभियान और युवा संवाद यात्राएं चल रही हैं, उससे पार्टी 2027 में ‘तीसरे विकल्प’ के तौर पर खुद को पेश कर रही है। बेसक परिवर्तन प्रकृति का नियम है, 2027 में उत्तराखंड की जनता राष्ट्रीय दलों से कितनी त्रस्त है और क्षेत्रीय विकल्प को कितना मौका देती है, यह चुनावी नतीजे ही बताएंगे। यूकेडी के लिए चुनौती होगी धन और संगठन के साथ-साथ वोटों को सीटों में बदलना।





























