लेखक: पर्यावरण प्रेमी शंकर सिंह बिष्ट
खनसर–माईथान घाटी में जंगल सिर्फ पेड़ों का नाम नहीं हैं,वे यहां के लोगों की जिंदगी, संस्कृति और इतिहास का हिस्सा रहे हैं। लेकिन आज यही जंगल एक कड़वी सच्चाई बयान कर रहे हैं जो कभी अपना था, वह अब प्रतिबंधित हो चुका है। इंडियन फोरेस्ट एक्ट 1927 से शुरू हुई यह दूरी,फोरेस्ट राइट एक्ट 2006 के बावजूद खत्म नहीं हो पाई। सवाल यह है कि जब कानून अधिकार देने की बात करता है, तो खनसर–माईथान के लोग आज भी अपने ही जंगलों में हक़ के लिए क्यों भटक रहे हैं?
खनसर–माईथान घाटी की आज की तस्वीर एक गहरी विडंबना को उजागर करती है। जंगल यहीं हैं, बिल्कुल आस पास लेकिन उन पर हक़ नहीं है। पीढ़ियों से जिन वनों ने जीवन दिया, आज वही जंगल बंद दरवाज़े बन चुके हैं। सवाल यह है कि जंगल बदले हैं, या नीतियाँ? कहानी नई नहीं है। इसकी जड़ें उस दौर में हैं जब इंडियन फोरेस्ट एक्ट 1927 लागू हुआ। जंगलों को “रिज़र्व” घोषित किया गया और लोगों के अधिकार चराई, लकड़ी, घास सब सीमित कर दिए गए। जंगल, जो कभी जीवन थे, राजस्व बन गए। खनसर–माईथान भी इसी बदलाव की चपेट में आ गया, जहां इंसान और जंगल के बीच का रिश्ता टूट गया।
फिर 1930 का दशक आया। आवाज़ उठी। कहीं-कहीं वन पंचायतें बनीं। लोगों को थोड़ी भागीदारी मिली। लेकिन हर जगह नहीं।खनसर–माईथान उन इलाकों में रहा, जहां यह व्यवस्था ज़मीन पर उतर ही नहीं पाई। नतीजा आज भी पूरा क्षेत्र सख्त नियमों में जकड़ा हुआ है।
2006 में एक और उम्मीद जगी फोरेस्ट राइट एक्ट 2006। कानून ने कहा कि समुदायों को उनके पारंपरिक अधिकार वापस मिलेंगे। आंकड़े बताते हैं कि लाखों दावे हुए, कुछ मंज़ूर भी हुए लेकिन जब बात सामुदायिक अधिकारों की आती है, तो तस्वीर धुंधली हो जाती है। उत्तराखंड में यह धुंध और गहरी है खनसर–माईथान आज भी इंतज़ार में है कानून है, लेकिन अधिकार नहीं।
आज हाल यह है कि अपने ही जंगल में घास काटना, पशु चराना, पानी के लिए छोटी खाल बनाना सब संघर्ष बन गया है। वह जंगल, जो कभी अपना था, अब पराया हो गया है। और विडंबना देखिए न लोग पूरी तरह उपयोग कर पा रहे हैं, न वन विभाग अकेले संरक्षण कर पा रहा है। नतीजा—झाड़ियाँ बढ़ रही हैं, जल स्रोत सूख रहे हैं, आग की घटनाएं बढ़ रही हैं।
लेकिन क्या पूरी जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की है? शायद नहीं। एक सच्चाई यह भी है कि जहां लोगों ने संगठित होकर आवाज़ उठाई, वहां बदलाव आया। जहां नहीं उठी, वहां चुप्पी ही नीति बन गई। खनसर–माईथान में भी लंबे समय तक यह चुप्पी बनी रही।
अब सवाल यह नहीं है कि समस्या क्या है। सवाल यह है कि समाधान कौन खोजेगा? रास्ता अभी भी बंद नहीं है ग्राम सभा, सामूहिक पहल, और कानूनी दावे ये सिर्फ शब्द नहीं, विकल्प हैं। लेकिन इनके लिए ज़रूरी है जागरूकता, संगठन और इच्छाशक्ति।
खनसर–माईथान की कहानी सिर्फ एक घाटी की नहीं है। यह उस देश की कहानी है जहां जंगल बचाने वाले ही जंगल से दूर कर दिए गए हैं। अंग्रेज चले गए, लेकिन उनकी बनाई सोच कहीं न कहीं अभी भी बची हुई है और अंत में बस एक सवाल जंगल किसके हैं? कागज़ के या उन लोगों के, जो सदियों से उनके साथ जीते आए हैं?



























