जो डर कभी जंगली जानवरों से था, अब अपनी ही सरकार से होने लगा है। उत्तराखंड का झूमाखेत जहां जंगल सिर्फ पेड़ों का नाम नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा है। वहां अब तक चाल-खाल बनाना परंपरा थी, पर अब अपराध बना दिया गया है। ग्रामीणों के हाथों की मेहनत को नियमों की जंजीरों में जकड़ा जा रहा है।
सवाल ये है कि जंगल किसके हैं,कागज़ के या उन लोगों के जो पीढ़ियों से उन्हें सींचते आए हैं? और इस सवाल का जवाब, पहाड़ की चुप्पी में कहीं खोता जा रहा है।



























