हल्द्वानी । सरकार के चुनावी मोड पर जाते ही उत्तराखंड में दायित्व बांटने का सिलसिला शुरू हो गया है। प्रदेश में बधाई देने का जश्न चल रहा है यहां सवाल यह है कि क्या यह जश्न जनता का है या सत्ता के दरबार का? कहानी की शुरूआत होती है नियुक्तियों से, सरकार ने तमाम लोगों को दर्जाधारी के पद से नवाजा है। बांटे गए पद ऐसे, जिनमें जिम्मेदारी कम और पहचान ज़्यादा दिखती है, लेकिन पहचान का भी अपना वजन होता है और वह वजन सीधे सरकारी खजाने पर पड़ता है। अगर गणित लगाएँ, तो हर दर्जाधारी को लगभग 80 हजार रुपये महीने के वेतन-भत्ते। 83 लोगों का हिसाब जोड़िए तो करीब 66 लाख रुपये हर महीने। साल भर में यह रकम करोड़ों में पहुँच जाती है। यह रकम कहाँ से आती है? जनता की जेब से। अब तस्वीर का दूसरा पहलू देखिए। उत्तराखंड में बेरोजगारी कोई नई खबर नहीं है। डिग्रियाँ दीवारों पर टंगी हैं और नौकरियाँ फाइलों में अटकी हैं। ऐसे में सवाल उठता है क्या सरकार के पास रोजगार देने के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन दर्जाधारी बनाने के लिए हैं? और फिर मीडिया की भूमिका देखिए कुछ चेहरे, जो खुद को पत्रकार कहते हैं, अपने करीबियों की खबरें छापने में व्यस्त हैं। खबर कम, प्रचार ज़्यादा। सवाल कम, संबंध ज़्यादा। मानो खबरों का काम अब सूचना देना नहीं, बल्कि संबंध निभाना हो गया है।
एसे में एक सीधा सवाल बनता है क्या यह लोकतंत्र है, या दर्जा-तंत्र? जहाँ काबिल लोग लाइन में खड़े हैं, और करीबी कुर्सियों पर बैठे हैं। जहाँ रोजगार की खबर गायब है और बधाइयों की हेडलाइन छपी है।




























