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सपनों को आकाश छूने की इजाज़त

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नेहा खत्री, जयपुर

सुनो प्रिय,
तुम कभी भी किसी के लिए भी सिर्फ गरमा-गरम भोजन परोसने वाली मत बनना,
तुम वह बनना—
जिसके सपनों को आकाश छूने की इजाज़त हो,
पर अपनी जड़ों से बंधी रहने की समझ भी हो…
तुम वह बनना—
जिससे तुम्हारी माँ का चेहरा सूरजमुखी-सा खिल उठे,
और पिता का शीश गर्व से ऊँचा रहे…
तुम अपने प्रिय की प्रिय भी बनना,
पर खुद को खोकर नहीं,
अपनी पहचान के उजाले में ही किसी का साथ निभाना…
तुम इतनी मजबूत बनना—
कि हर लड़ाई में खुद का हाथ थाम सको,
और इतनी कोमल भी—
कि हर जीत में मुस्कान बनी रहो…
क्योंकि तुम सिर्फ एक भूमिका नहीं,
एक पूरी कहानी हो—
जिसे दुनिया नहीं,
तुम खुद लिखती हो… ।