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सूंड का सहारा

1786

ललिता कापड़ी


“क्या सफलता इंसान को इतना बड़ा बना देती है कि वह अपने उपकार करने वालों को ही भूल जाए?”


हल्द्वानी । घने जंगल में एक रात तेज़ तूफ़ान आया। उसी तूफ़ान में हाथियों के झुंड से एक छोटा हाथी बिछड़ गया। वह काँपता हुआ, भूखा और डरा हुआ जंगल में इधर-उधर भटक रहा था। तभी वहाँ एक बूढ़ा हाथी आया। उसने बच्चे को प्यार से अपनी सूंड में उठाया और अपने घर ले गया।
बूढ़े हाथी ने उसे केवल भोजन और आश्रय ही नहीं दिया, बल्कि उसे जीने का साहस भी दिया। वह रोज़ उससे कहता, “तुम कमजोर नहीं हो, तुम्हारे भीतर एक नेता छिपा है।” वह उसे जंगल के रास्ते, मुश्किलों से लड़ना और दूसरों की रक्षा करना सिखाता रहा।
साल बीतते गए। छोटा हाथी अब विशाल, शक्तिशाली और पूरे झुंड का नेता बन गया। सब उसकी प्रशंसा करते थे। लेकिन प्रशंसा के साथ उसके भीतर घमंड भी बढ़ने लगा। उसने उस बूढ़े हाथी को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया, जिसने उसे जीवन दिया था।
धीरे-धीरे उसके साथी उससे दूर हो गए। एक दिन वह जंगल के उसी पुराने पेड़ के नीचे अकेला खड़ा था, जहाँ कभी वह रोता हुआ मिला था। चारों ओर सन्नाटा था, लेकिन उसके भीतर पछतावे का शोर गूंज रहा था। उसे पहली बार समझ आया कि ऊँचाई पर पहुँचना बड़ी बात नहीं, वहाँ तक पहुँचाने वाले हाथों का सम्मान करना सबसे बड़ी बात है। उसने बूढ़े हाथी को बहुत खोजा, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
सीख : जो अपने उपकार करने वालों को भूल जाता है, अंत में वह अकेला रह जाता है।