देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहाँ जनता के सवाल पीछे छूटते जा रहे हैं और सत्ता का संगठनात्मक अहंकार आगे निकलता जा रहा है। बेरोजगार युवा सड़कों पर हैं, आशा कार्यकर्ता महीनों से अपनी मांगों के लिए धरनों पर बैठी हैं, संविदाकर्मी अदालतों के आदेशों के बाद भी नियमितीकरण की राह देख रहे हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में जैसे इन आवाज़ों की कोई गूंज ही नहीं सुनाई देती। भारतीय जनता पार्टी आज इतनी विशाल संगठनात्मक ताकत बन चुकी है कि उसे शायद अब जनता की बेचैनी से ज्यादा अपने राजनीतिक ढांचे की मजबूती पर भरोसा है। पन्ना प्रमुख से लेकर संघ और तमाम प्रकोष्ठों की यह मशीनरी चुनाव जिताने में सक्षम है, इसलिए जनसरोकार धीरे-धीरे हाशिए पर धकेले जाते दिख रहे हैं। यही वजह है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं और संगठन की राजनीति केंद्र में आ गई है।इसी बीच चम्पावत में घटित एक घटना ने पूरे उत्तराखंड को शर्मसार कर दिया है। एक नाबालिग बेटी के साथ हुई दरिंदगी केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि उस सामाजिक और राजनीतिक गिरावट का आईना है, जिसमें बेटियों की सुरक्षा भाषणों और नारों तक सीमित होकर रह गई है। मंचों पर “बेटी बचाओ” के नारे लगाए जाते हैं, महिलाओं के सम्मान की बातें होती हैं, लेकिन ज़मीन पर एक मासूम की अस्मिता को राजनीतिक रंजिशों और सत्ता के खेल में कुचल दिया जाता है। यह सवाल अब केवल अपराधियों पर नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर उठ रहा है जो ऐसे लोगों को संरक्षण देती दिखाई देती है।

चम्पावत की यह घटना इसलिए भी ज्यादा गंभीर मानी जा रही है क्योंकि इसमें जुड़े दोनों पक्षों के भाजपा से संबंध बताए जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों और वीडियो में कथित तौर पर कई लोग मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के करीबी नजर आ रहे हैं। ऐसे में जनता यह सवाल पूछ रही है कि आखिर जिस पार्टी और सरकार की राजनीति महिलाओं की सुरक्षा के दावों पर खड़ी होती है, उसी व्यवस्था के भीतर एक 16 वर्षीय नाबालिग लड़की कैसे षड्यंत्र और अपराध का शिकार बन जाती है?
समाज के भीतर गुस्सा इसलिए भी बढ़ रहा है क्योंकि हर बार बेटियों की चीख़ों से ज्यादा शोर राजनीति का सुनाई देता है। अपराध के बाद न्याय की बात कम होती है और राजनीतिक बचाव ज्यादा दिखाई देता है। यही वजह है कि लोगों का भरोसा लगातार कमजोर हो रहा है। यह केवल चम्पावत की घटना नहीं है, बल्कि पूरे उत्तराखंड के माथे पर लगा वह दाग है जिसने देवभूमि की आत्मा को झकझोर दिया है।
इससे पहले भी मुख्यमंत्री राहत कोष के इस्तेमाल को लेकर आरटीआई के जरिए सवाल उठ चुके हैं, जिसमें आरोप लगे कि आम जरूरतमंदों से ज्यादा लाभ भाजपा कार्यकर्ताओं को मिला। इन घटनाओं ने विपक्ष और सामाजिक संगठनों को यह कहने का मौका दिया है कि भाजपा अब आम जनमानस से ज्यादा अपने संगठन और कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने लगी है। राजनीतिक रूप से मजबूत होना किसी भी दल की उपलब्धि हो सकती है, लेकिन जब वही ताकत जनता के दर्द से दूरी पैदा करने लगे, तब लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ने लगता है।
अब सवाल केवल एक घटना का नहीं है। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड की राजनीति जनता के मुद्दों से दूर होकर केवल सत्ता बचाने की राजनीति बनती जा रही है? क्या बेटियों की सुरक्षा भी अब राजनीतिक निष्ठाओं के तराजू पर तौली जाएगी? और सबसे बड़ा सवाल क्या देवभूमि की संवेदनशील पहचान को राजनीतिक संरक्षण और संगठनात्मक घमंड के हवाले कर दिया गया है?



























