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हुनर अनशन पर, सत्ता खामोश

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सोनम वांगचुक का अनशन आईना है

जिस देश में एक आईएएस राजनेता बन सकता है, पर एक वैज्ञानिक को अपने हक के लिए भूख हड़ताल करनी पड़े, वहां सवाल व्यवस्था से है। आज भी हम उसी देश में जी रहे हैं। यहां एक आईएएस अधिकारी चुनाव लड़कर राजनेता बन सकता है, लेकिन एक राजनेता आईएएस नहीं बन सकता। फिर भी वही राजनेता उस आईएएस के तबादले और निलंबन के आदेश पर दस्तखत करता है। और इसी व्यवस्था के बीच पिछले 19 दिनों से लद्दाख का बेटा, इंजीनियर और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर बैठे हैं। वही सोनम वांगचुक जिनकी जिंदगी पर ‘3 इडियट्स’ जैसी फिल्म बनी। वे आज युवाओं के बेहतर भविष्य के लिए सड़क पर हैं।

सरकार खामोश है। इसी खामोशी के बीच एक पुरानी लाइन फिर गूंजती है: “हुनर सड़कों पर है और भ्रष्टाचारी मौज काट रहे हैं।”

जेल से अनशन तक का सफर

पीपुल भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार वांगचुक नीट परीक्षा में गड़बड़ी और लद्दाख के संवैधानिक अधिकारों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। सितंबर 2025 में लद्दाख में हुए हिंसक प्रदर्शन के बाद उन्हें NSA के तहत हिरासत में लिया गया। 26 सितंबर 2025 से 14 मार्च 2026 तक वे जोधपुर जेल में रहे। जेल में भी उन्होंने हार नहीं मानी। रात का तापमान 6 डिग्री तक गिर जाता था। खिड़कियों पर शटर नहीं थे। इस समस्या को देखकर उन्होंने बैरकों को सर्दी में गर्म और गर्मी में ठंडा रखने का सिस्टम डिजाइन किया। बोरवेल के 25 डिग्री पानी को पाइपों से गुजारकर तापमान नियंत्रित करने का उनका आइडिया खूब सराहा गया।

कौन हैं सोनम वांगचुक?

  • जन्म: 1 सितंबर 1966, उलेटोपो, लेह, लद्दाख।
  • शिक्षा: एनआईटी श्रीनगर से इंजीनियरिंग। 9 साल तक स्कूल न होने पर मां से पढ़ाई की।
  • परिवार: पिता सोनम वांगयाल जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री रहे। पत्नी गीतांजलि जे. आंगमो, शिक्षाविद् और उद्यमी।
  • पहचान: 9 भाषाओं के जानकार। HIAL और SECMOL के संस्थापक।
  • नवाचार: माइनस तापमान में गर्म रहने वाले घर, व्यर्थ पानी से कृत्रिम ग्लेशियर, सेना के लिए -14 डिग्री में काम करने वाले सोलर टेंट।
  • सम्मान: टाइम मैगजीन 2025 की ‘100 मोस्ट इन्फ्लुएंशियल क्लाइमेट लीडर्स’, 2018 रेमन मैग्सेसे पुरस्कार।

उन्होंने लद्दाखी भाषा में विज्ञान और गणित पढ़ाने की मुहिम भी शुरू की ताकि बच्चे अपनी मातृभाषा में सीख सकें।

अनशन के पीछे का दर्द

वांगचुक का संघर्ष सिर्फ एक परीक्षा या एक राज्य तक सीमित नहीं है। लद्दाख के लोग संविधान की छठी अनुसूची लागू करने, पूर्ण राज्य का दर्जा और स्थानीय जमीन-रोजगार की सुरक्षा मांग रहे हैं। जब चुनी हुई स्थानीय गवर्निंग बॉडी और सत्ता से टकराव बढ़ा, तो प्रशासन ने उनके संस्थान HIAL का पट्टा भी रद्द कर दिया। यही विरोधाभास चुभता है। एक तरफ देश का वो दिमाग जिसने शिक्षा, पर्यावरण और रक्षा के लिए तकनीक दी, उसे अपनी बात मनवाने के लिए भूखा बैठना पड़ रहा है। दूसरी तरफ कुर्सी तय करती है कि किसकी सुनी जाएगी।

सवाल हम सब से

आनंद महिंद्रा ने ठीक कहा था: “सोनम यह साबित करते हैं कि एक इनोवेटर देश की कितनी बड़ी सेवा कर सकता है।”
तो फिर सवाल है, हम सेवा करने वालों को सुनते कब हैं?

जब मिट्टी-पत्थर से कम लागत का पर्यावरण-मैत्री घर बनाने वाला इंजीनियर सड़क पर उतरे। जब कृत्रिम ग्लेशियर बनाकर पानी बचाने वाला व्यक्ति इस्तीफे की मांग करे। तब समझिए समस्या व्यक्ति की नहीं, व्यवस्था की प्राथमिकताओं की है।सरकार सोई है या सुनना नहीं चाहती, यह बहस का विषय है। पर इतना तय है कि जिस देश में हुनर को अनशन करना पड़े और सत्ता को जगाने में 19 दिन से भी अधिक समय लग जाएं, वहां बदलाव की घंटी बहुत देर से बजती है। सोनम वांगचुक का अनशन सिर्फ लद्दाख का मुद्दा नहीं है। यह हर उस युवा, शिक्षक, वैज्ञानिक और आम नागरिक का मुद्दा है जो मानता है कि देश नीतियों से नहीं, नीयत से चलता है। अब देखना यह है कि सरकार कब नींद से जागती है बस उससे पहले कहीं हुनर दम न तोड़ दे।