Home विशेष आत्मनिर्भर आदि ग्रामीण व्यवस्था: भारतीय स्वावलंबन का कालजयी गौरव

आत्मनिर्भर आदि ग्रामीण व्यवस्था: भारतीय स्वावलंबन का कालजयी गौरव

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विगत कुछ वर्षों से संपूर्ण राष्ट्र के बौद्धिक और प्रशासनिक गलियारों में ‘आत्मनिर्भर भारत’ की संकल्पना पर एक व्यापक और गंभीर विमर्श चल रहा है । मूल प्रश्न यह है कि आधुनिकता की दौड़ में पीछे छूटते गाँवों को पुन: आत्मनिर्भर कैसे बनाया जाए? उन्हें देश के सर्वांगीण विकास की मुख्यधारा में किस प्रकार एक महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका में स्थापित किया जाए? इस पुनीत लक्ष्य की प्राप्ति हेतु वर्तमान में केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा निरंतर नीतिगत प्रयास किए जा रहे हैं । किंतु, यदि हम इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों को पलटकर देखें, तो भारतीय गाँवों की आत्मनिर्भरता किसी सरकारी अनुदान पर आश्रित नहीं थी, बल्कि वह उनकी जीवनशैली का अभिन्न अंग थी । प्राचीन काल से ही भारतीय गाँव ‘स्वावलंबन’ के ऐसे दीप स्तंभ रहे हैं, जिनकी चमक आज भी सुदूर ग्रामीण अंचलों और प्राचीन जनजातीय परंपराओं में बखूबी देखी जा सकती है ।

थारू जनजाति: सामूहिक श्रम और अटूट सामंजस्य की मिसाल

सदियों पुरानी आत्मनिर्भरता की परंपरा को अपनी रगों में संजोए ‘थारू’ जनजाति आज भी ‘अपना काम अपने हाथ’ की प्राचीन उक्ति को जीवंत किए हुए है । इस समाज की सबसे बड़ी शक्ति उनकी ‘सामूहिकता’ है; वे अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को मिल-जुलकर ही संपन्न करते आए हैं । थारू समाज ने अपने और अपने समाज के समस्त उत्तरदायित्वों को किसी बोझ की तरह नहीं, बल्कि खेल-खेल में अत्यंत सहजता के साथ निभाया है ।

चाहे वह गाँव के लिए जलाशय का निर्माण करना हो या कृषि हेतु सिंचाई की व्यवस्था को सुचारू बनाए रखना, उनकी प्रबंधन क्षमता अद्भुत है । इन सामुदायिक निर्णयों का केंद्र ‘पंचायत’ होती है, जहाँ ‘गढ़धुर’ (समूह की धुरी अर्थात मुखिया) अंतिम निर्णय लेता है । विशेषकर वर्षा ऋतु में, जब नदी-नालों का तेज प्रवाह व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देता है या पहाड़ों की ढलान से आए पत्थर जल मार्ग को अवरुद्ध कर देते हैं, तब ‘गढ़धुर’ ही सामूहिक श्रमदान का स्थान और समय सुनिश्चित करता है ।

इस व्यवस्था की लोकतांत्रिक मर्यादा देखिए—पाँच सदस्यों की इस बैठक में यह तय किया जाता है कि प्रत्येक परिवार से कम से कम एक सदस्य इस सामूहिक कार्य हेतु अनिवार्य रूप से आएगा । यदि कोई बिना ठोस कारण के नियमों का उल्लंघन कर नाले की सफाई जैसे कार्यों में सम्मिलित नहीं होता, तो उसके लिए दंड का भी प्रावधान रखा गया है । इसी प्रकार समय-समय पर तालाबों और अन्य जलाशयों की स्वच्छता का उत्तरदायित्व भी पूरा समाज मिलकर उठाता है।

ग्रामीण न्याय प्रणाली: आधुनिक न्यायिक तंत्र से श्रेष्ठ

न्यायिक दृष्टि से विचार करें तो यह पारंपरिक समाज अपनी स्व-निर्मित व्यवस्थाओं के कारण आज के जटिल और खर्चीले न्यायिक सिस्टम से कहीं अधिक प्रभावी और मानवीय है । ‘घर की बात घर में निपटाना’ भारतीय सामाजिक परंपरा का एक अत्यंत गौरवशाली अध्याय रहा है । जहाँ इस परंपरा को विस्मृत कर दिया गया, वहाँ समाज को अक्सर ‘बंदर-बाँट’ जैसी विद्रूपताओं का सामना करना पड़ा है ।

भारतीय जीवन दर्शन की इस सादगी और न्यायप्रियता को आज भी आदिवासियों के बीच प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है । थारू समाज में यदि दो व्यक्तियों या परिवारों के बीच कोई विवाद या मनमुटाव होता है, तो वे बाहरी हस्तक्षेप के बजाय आपसी सुलह से उसे तत्काल निपटा लेते हैं । वर्तमान के तथाकथित ‘पढ़े-लिखे’ समाज को इस उच्च स्तरीय सामाजिक समझ को जानने और समझने की नितांत आवश्यकता है ।

विडंबना यह है कि जैसे-जैसे आधुनिक शिक्षा का विस्तार हुआ, गाँव और परिवार विवादों के केंद्र बनते गए । आज का शिक्षित समाज प्रायः इन पुरातन परंपराओं को ‘अंधविश्वास’ या ‘ढकोसला’ मानकर उनकी उपेक्षा करता है । जबकि सत्य यह है कि “भारत की आत्मा गाँवों में बसती है” और इन ग्रामीण व्यवस्थाओं को आदिकाल के संदर्भ में गहनता से जांचने-परखने की जरूरत है ।

ऐतिहासिक विकास: नवपाषाण काल से सिंधु सभ्यता तक

भारतीय ग्रामीण संस्कृति ने नवपाषाण काल की शैशवावस्था से लेकर मध्यकालीन और पूर्व-आधुनिक काल तक एक चरणबद्ध विकास किया है । प्रत्येक काल में इसने नई कड़ियां जोड़ीं और स्वयं को आत्मनिर्भर बनाए रखा । ग्रामीण व्यवस्था समय के साथ गतिशील तो रही, किंतु उसने अपने मूल स्थायित्व को कभी खोने नहीं दिया । चार्ल्स मेटकॉफ ने भारतीय गाँवों के संदर्भ में अत्यंत सटीक कहा था कि “भारतीय गाँव छोटे गणतंत्र हैं, जो किसी भी बाहरी संपर्क से लगभग स्वतंत्र और अपरिवर्तनीय रहे हैं” । इन गाँवों को प्राणवायु प्रदान करने वाले विभिन्न शिल्पी और व्यवसायी समुदाय थे, जो गाँव की परिधि के भीतर ही जीवन की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति कर देते थे ।

प्राचीन बस्तियों का उदय

  • मेहरगढ़: भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन नवपाषाणिक बस्ती बलूचिस्तान के मेहरगढ़ (लगभग 7000 ई.पू.) में मिलती है ।
  • बुर्जहोम एवं गुफकराल: कश्मीर की इन प्राचीन बस्तियों से ही ग्रामीण समाज ने स्वयं को उस आकार में ढालना शुरू किया, जिससे ग्रामवासी आत्मनिर्भर बन सकें ।
  • स्थायी जीवन का प्रारंभ: इस काल के ग्रामीणों ने घुमक्कड़ जीवन त्यागकर खेती, पशुपालन, वस्त्र सिलाई, कुंभकारी और अनाज पीसने जैसे कौशलों के साथ स्थायी बस्तियों और गोलाकार झोपड़ियों में रहना शुरू कर दिया था । अब मनुष्य केवल उपभोगकर्ता नहीं, बल्कि उत्पादक भी बन चुका था ।

उन्नत ग्रामीण संस्कृति और प्रथम नगरीय सभ्यता

सिंध, पंजाब, राजस्थान (कालीबंगा) और हरियाणा (बनावली) की ग्रामीण संस्कृतियाँ अपने समय की सर्वाधिक उन्नत संस्कृतियाँ थीं । यहाँ सुनियोजित भवन, सुदृढ़ सुरक्षा दीवारें और जल निकासी की श्रेष्ठ व्यवस्था विद्यमान थी । इसी समृद्ध ग्रामीण आधार के अधिशेष (Surplus) उत्पादन के कारण ही कालांतर में सिंधु सभ्यता जैसी विश्व की प्रथम नगरीय सभ्यता का उदय हुआ । इतिहासकारों के अनुसार, इस सभ्यता का सर्वाधिक उचित नाम ‘हड़प्पा सभ्यता’ है ।

हड़प्पाकालीन घरों का निर्माण अत्यंत वैज्ञानिक था। मुख्य द्वार गलियों की ओर खुलते थे, ताकि मुख्य सड़क के शोर और प्रदूषण से बचा जा सके । प्रत्येक घर में अपना कुआँ, रसोई, आँगन, स्नानागार और ढकी हुई नालियाँ होती थीं । रोशनी और हवा के लिए पत्थर की जालियों का प्रयोग किया जाता था । सड़कों पर कूड़े के लिए गड्ढे और जल निकासी हेतु नालियों का जाल बिछा था, जो आगे मुख्य नालों में मिल जाता था । आर्थिक रूप से समृद्ध किसान अपनी जरूरत से अधिक अनाज उपजाते थे और उसे नगरों में भेजकर विभिन्न शिल्पियों, व्यापारियों और नागरिकों की जरूरतों को पूरा करते थे ।

वैदिक सभ्यता: पूर्णतः आत्मनिर्भर ग्रामीण समाज

हड़प्पा के पश्चात वैदिक या आर्य सभ्यता का प्रादुर्भाव हुआ, जो मूलतः एक ग्रामीण संस्कृति थी । यहाँ राजनीतिक संगठन की सबसे छोटी इकाई ‘कुल’ या परिवार थी और कई परिवारों के मेल से ‘ग्राम’ बनता था ।

  • ग्रामणी और शासन: ग्राम का मुखिया ‘ग्रामणी’ कहलाता था, जो नागरिक और सैनिक दोनों कार्यों को देखता था । जन का अधिपति ‘जनपति’ प्रजा के हित में कार्य करता था और बदले में प्रजा उसे ‘बलि’ (अन्न या उपहार) देती थी ।
  • लोकतांत्रिक संस्थाएँ: ‘सभा’ (कुलीन/वृद्धों की संस्था) और ‘समिति’ (सर्वसाधारण की संस्था) की इतनी महत्ता थी कि शक्तिशाली राजा भी उनके निर्णय के विरुद्ध जाने का साहस नहीं कर पाता था ।
  • कृषि एवं सिंचाई: आर्य खेती में खाद के प्रयोग और उन्नत सिंचाई तकनीकों जैसे कुल्या (नहरें), कूप और अश्मचक्र (रहट) से भलीभांति परिचित थे । 6 से 12 बैलों वाले हलों से जुताई होती थी ।
  • व्यवसाय एवं सामाजिक प्रतिष्ठा: गाँव के स्वावलंबन में बढ़ई, लोहार, स्वर्णकार, जुलाहे और वैद्य जैसे विभिन्न समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका थी । इनमें बढ़ई का व्यवसाय सर्वाधिक प्रतिष्ठित था । ऋग्वेद का एक श्लोक इस सामाजिक समरसता को प्रमाणित करता है— “मैं कवि हूँ, मेरा पिता वैद्य है और मेरी माता अन्न पीसने वाली है” । उस समय किसी भी व्यवसाय को तुच्छ नहीं माना जाता था और समाज में सबकी प्रतिष्ठा थी ।

मौर्य काल और गुप्त काल: विकेंद्रीकरण और सामंतवाद

छठी शताब्दी ई.पू. तक गंगा घाटी के गाँवों में कृषि योग्य भूमि (क्षेत्र) और सामूहिक चारागाहों (वन या दाव) की व्यवस्था सुदृढ़ हो चुकी थी । ग्राम सभाएँ अनुभवी बुजुर्गों के मार्गदर्शन में सड़कों, तालाबों, धर्मशालाओं और संस्थागारों का निर्माण करवाती थीं । जातक ग्रंथों में 18 प्रकार के व्यवसायों और उनकी श्रेणियों (guilds) का उल्लेख मिलता है, जो अपने सदस्यों के हितों की रक्षा करती थीं ।

मौर्य प्रशासन और राजकीय उत्तरदायित्व

मौर्य युग में प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ‘ग्राम’ थी । अर्थशास्त्र में ‘ग्रामवृद्ध परिषद’ का उल्लेख है, जो सार्वजनिक हित, मनोरंजन, साफ-सफाई और नाबालिगों की संपत्ति का प्रबंध करती थी । राज्य सामान्यतः ग्रामीण शासन में हस्तक्षेप नहीं करता था । ‘गोप’ नामक अधिकारी निवासियों का विवरण सुरक्षित रखते थे, जबकि अकाल और महामारी के समय प्रजा की सुरक्षा के लिए ‘कोष्ठागारों’ (अन्नागारों) से अनाज वितरित किया जाता था । सम्राट अशोक ने पारदर्शिता हेतु ‘राजुक’ नामक ग्रामीण अधिकारियों की नियुक्ति की थी, जो भूमि विवादों और कर निर्धारण का कार्य करते थे ।

गुप्त काल और सामंतवाद का उदय

गुप्त काल में प्रशासन और भी विकेंद्रीकृत हुआ । मध्य भारत में ग्राम सभा को ‘पंचमंडली’ और बिहार में ‘ग्राम जनपद’ कहा जाता था । सामंतवाद के विस्तार से आत्मनिर्भर ग्राम व्यवस्था को अत्यधिक प्रोत्साहन मिला । हालांकि, इस काल में शिल्पियों और व्यापारियों के आवागमन पर कुछ प्रतिबंध भी लगे, जिससे स्थानीयकरण की भावना प्रबल हुई और कृषि एवं पशुपालन आर्थिक जीवन के मुख्य आधार बन गए ।

दक्षिण भारत की स्वायत्त ग्रामीण संस्थाएं: एक आदर्श मॉडल

विंध्य पर्वत से कन्याकुमारी तक विस्तृत दक्षिण भारत में भी ग्राम शासन की अद्भुत प्रणालियाँ विद्यमान थीं । चालुक्य काल में ग्राम अधिकारी ‘गामुंड’ कहलाता था । राष्ट्रकूट शासकों के समय इसे ‘ग्रामकूट’ या ‘ग्रामपति’ कहा जाता था ।

चोल शासन की असाधारण स्वायत्तता

चोल शासकों के समय ग्रामीण संस्थाएं केंद्रीय नियंत्रण से लगभग मुक्त और पूर्णतः स्वायत्त थीं। गाँवों में दो प्रमुख संस्थाएँ थीं:

  1. उर: समस्त ग्रामवासियों की सामान्य सभा ।
  2. सभा या महासभा: ब्राह्मणों को दान दिए गए गाँवों (अग्रहारों) की संस्था, जिसका शासन ‘महाजन’ चलाते थे ।

चोल ग्राम सभाएँ विभिन्न ‘वारियम’ (समितियों) के माध्यम से कार्य करती थीं, जैसे— तोट्टवारियम (उद्यान), एरीवारियम (तालाब), पोनवारियम (स्वर्ण) और न्यायत्तार वारियम (न्याय) । समिति के सदस्यों का चुनाव ‘कुडवोलै’ (लॉटरी पद्धति) से 30 वार्डों में बांटकर किया जाता था । एक विशेष नियम यह था कि जो पिछले तीन साल से सदस्य रहा हो, वह नया सदस्य नहीं चुना जा सकता था, ताकि सबको अवसर मिले ।

चोल काल में ग्राम वस्तुतः ‘लघु गणतंत्र’ थे । वहाँ स्वायत्तता इतनी अधिक थी कि उच्च स्तर पर होने वाले राजनीतिक परिवर्तन भी ग्रामीण व्यवस्था को प्रभावित नहीं कर सकते थे । प्रत्येक ग्राम राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से पूर्णतः आत्मनिर्भर था ।

मध्यकाल और आधुनिक युग की प्रासंगिकता

मध्यकाल में भी ग्राम समुदाय पूर्ववर्ती समाज का मजबूत स्तंभ बना रहा । समाज में पूजा-पाठ करने वाले और चर्मकार, दोनों का सम्मान बराबर था । कुम्हार, लोहार, नाई, धोबी, सुनार और दर्जी जैसे व्यवसायों की अपनी महत्ता थी ।

गाँव की आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा आधार यह था कि सभी समुदाय एक-दूसरे पर निर्भर होकर भी स्वयं को सुदृढ़ रूप से स्थापित किए हुए थे । दाई जैसे पात्र, चाहे किसी भी जाति के हों, प्रत्येक परिवार के लिए अनिवार्य थे और उन्हें विशेष सम्मान प्राप्त था । यह पैतृक पेशा गाँव को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों को भी आर्थिक रूप से मजबूत करता था।

राज्य सरकारों का भी यह प्रयास रहता था कि गाँवों से प्रवर्जन (पलायन) न हो । बीकानेर के अभिलेखों के अनुसार, जब 1781ई. में चौधरी दुर्गेश्वर ने पलायन की योजना बनाई, तो सरकार ने उसे करों में छूट देकर गाँव में ही रुकने के लिए प्रेरित किया । नया गाँव बसाने के लिए भी यह शर्त होती थी कि वह केवल एक जाति का न होकर विभिन्न व्यवसाय करने वाली ‘गुवाड़ियों’ का समूह हो । गुजरात और दक्कन के क्षेत्रों में शिल्पियों के भरण-पोषण हेतु कर-मुक्त भूमि देने के साक्ष्य भी मिलते हैं ।

भविष्य का मार्ग

अतः, समस्त कालखंडों और परिस्थितियों के सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि भारत के विकास का वास्तविक मार्ग गाँवों की समृद्ध आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन से ही होकर गुजरता है । आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भारतीय गाँवों में निहित प्राचीन कौशल का आधुनिक संदर्भों में सुयोग्य प्रबंधन करें और ग्रामीण समाज के प्रति अपने संकुचित नजरिए को बदलें ।