Home उत्तराखंड सत्ता बदलती रही, पर पहाड़ की तकलीफ जस की तस

सत्ता बदलती रही, पर पहाड़ की तकलीफ जस की तस

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घड़ियाली आंसू और भाषणों से गांव नहीं बसते, देश के लिए शहादत देने वालों के परिजन अपनी जान बचाने के लिए आज भी पहाड़ो में संघर्ष कर रहे 

उत्तराखंड को बने 25 साल से ज्यादा हो गए। राज्य बनते समय सपना था कि पहाड़ की जवानी पहाड़ में रहेगी, गांव आबाद रहेंगे, संस्कृति जिंदा रहेगी। आज तस्वीर उलटी है। सीमा पर राज्य का जवान शहीद हो रहा है, और पीछे गांव खाली हो रहे हैं। शहीदों के परिवार और गांव में बचे लोगों को मूलभूत सुविधाएं देना अब भी संघर्ष बना हुआ है। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए परिवारों को मैदान का रुख करना पड़ा। जहां पानी चाहिए था वहां टैंकर तक नहीं गए, जहां स्कूल चाहिए था वहां एक मास्टर के भरोसे पढ़ाई चली। सड़क पहुंची भी तो बस सेवा अनियमित रही। नतीजा ये कि घर बंद हुए, खेत बंजर हुए, लोकगीत और परंपराएं पीछे छूट गईं। सन् 2000 से अब तक कांग्रेस और भाजपा दोनों को सत्ता मिली। योजनाएं आईं, पर धरातल पर असर सीमित रहा। आरोप लगते रहे कि राष्ट्रीय दल पहाड़ के विकास से ज्यादा पार्टी हित और दिल्ली के समीकरणों को देखते हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी को पद्मभूषण मिला। समर्थक इसे लंबी सेवा का सम्मान मानते हैं, आलोचक पूछते हैं कि उनके पैतृक क्षेत्र में बुनियादी बदलाव क्यों नहीं दिखे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर भी वही सवाल है कि खटीमा से चुनाव हारने के बाद भी मुख्यमंत्री बनने के बाद पैतृक गांव के लिए कोई अलग पहचान वाला काम क्यों नहीं दिखा।
जब गांव में डॉक्टर नहीं, सड़क टूटी है, नौजवान बाहर है, तब बहस गांधी, हिंदू, लैंड जिहाद जैसे मुद्दों पर चली जाती है। दल बदल, तबादले, सत्ता समीकरण की चर्चा तेज रहती है। जनता को लगता है कि असली मुद्दे पीछे छूट गए। पहाड़ को बचाना है तो काम जमीन पर दिखना चाहिए। हर गांव में डॉक्टर, हर घर तक पानी, हर बच्चे के लिए अच्छा स्कूल, और स्थानीय स्तर पर रोजगार। होमस्टे, हर्बल खेती, पर्यटन और छोटे उद्योग तभी टिकेंगे जब बुनियादी ढांचा मजबूत होगा।
शहीदों के परिवारों के लिए सम्मान सिर्फ शब्दों में नहीं, सुविधाओं में दिखे। गांव तभी बसेंगे जब नीतियां पहाड़ की भौगोलिक सच्चाई से जुड़ेंगी। सत्ता बदली, पर पहाड़ की तकलीफ नहीं बदली। जब तक इसका जवाब नहीं मिलेगा, भाषणों से गांव नहीं बसेंगे। आरोप ये लगता है कि अपनों पर रहम और गैरों पर सितम की नीति ने पहाड़ के विकास को पीछे धकेल दिया। बात भले ही कड़वी हो पर सत्य यही है।

जिस पहाड़ी प्रदेश ने देश की रक्षा में सबसे अधिक शहादत दी, आज उसी प्रदेश में शहीदों के परिवार वाले जंगली जानवरों का शिकार बन रहे हैं। 2025 में अब तक तेंदुए, गुलदार और भालू के हमलों में लगभग 35 लोगों की मौत और 193 लोग घायल हो चुके हैं। पहाड़ी गांवों में हालात इतने बिगड़ गए हैं कि लोग खेत में काम करने, चारा लेने के लिए भी डर-डर कर निकलते हैं। बहरहाल इतना ही कहा जा सकता है कि शहीदों की धरती कहे जाने वाले इन गांवों में आज हालात ये हैं कि देश के लिए जान देने वालों के परिजन अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।