– सीए वरुण चन्दोला, युवा नेता, उत्तराखंड क्रांति दल कपकोट विधानसभा
2 अक्टूबर 1994 की वो रात… मुजफ्फरनगर में गोलियों की गूँज आज भी कानों में दर्द घोल देती है। खटीमा और मसूरी की सड़कें भी हमारे भाइयों के खून से लाल हुई थीं। उन्होंने सीना तानकर इसलिए गोली नहीं खाई थी कि दिल्ली की पार्टियाँ यहाँ राज करें। उन्होंने खून दिया था ताकि पहाड़ का पानी पहाड़ को सींचे और पहाड़ की जवानी पहाड़ का सीना चौड़ा करे। 25 साल का राज्य हो गया, पर माँओं का कलेजा आज भी रोज छलनी होता है।
पहाड़ का पानी आज भी रोता है। टिहरी का बांध दिल्ली को जगमगाता है, पर मेरी पौड़ी की बूढ़ी अम्मा आज भी अँधेरे में डिबरी टटोलती है। गंगा-यमुना बहती हैं, पर मेरा किसान भाई सूखे खेत के किनारे खड़ा बस आसमान ताकता है। बताओ, ये कैसा इंसाफ है कि पानी का घर ही प्यासा मर जाए?
पहाड़ की जवानी हर सुबह बसों में भरकर बेगानी हो जाती है। सुबह 4 बजे पहाड़ का बेटा पोटली उठाकर दिल्ली-मुंबई को निकलता है तो पीछे छूट जाती है एक बेबस माँ की सिसकी। जो हाथ बचपन में किताब पकड़ते थे, वो आज परदेस में जूठे बर्तन माँजते हैं। जो बेटी मास्टरनी बनकर गाँव के बच्चों का भविष्य संवारना चाहती थी, वो आज किसी कोठी में किसी और के बच्चे पाल रही है। गाँव में अब बारात नहीं आती, बस तेरहवीं की खबर आती है। ‘घोस्ट विलेज’ नाम सुनते ही कलेजा मुँह को आ जाता है।
और राष्ट्रीय दलों ने दिया क्या? छल, सिर्फ छल।
शहीद ने राज्य माँगा था अपनी माँ की कोख बचाने को। पर भाजपा-कांग्रेस ने सत्ता में आते ही हमारी कोख ही बेच डाली।
- मूल निवास 1950 खत्म किया: मेरी माँ से उसकी पहचान छीन ली। आज मेरा भाई अपने ही घर में किरायेदार बन गया।
- भू-कानून नीलाम कर दिया: कांग्रेस ने 2003 में पहली कील ठोकी, भाजपा ने 2018 में आखिरी। माफियाओं ने मेरी देवभूमि को प्लॉट बना दिया। वो पहाड़ जिसकी मिट्टी को हम माथे से लगाते थे, आज बिक रही है। पहाड़ का बेटा अपनी ही जमीन पर बेगाना, मजदूर बन गया।
ये गोली से भी बड़ा घाव है। यूकेडी ने लाशें उठाकर राज्य लिया था पहाड़ बचाने को, इन्होंने राज्य का इस्तेमाल पहाड़ बेचने को किया।
“पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम आएगी” का नारा हमारे पुरखों ने खून से लिखा था। इन्होंने नारा चुराया और उसे जुमला बना दिया। हर चुनाव में मंच से दहाड़ते हैं, और जीतते ही पहाड़ को फिर निचोड़ देते हैं।
सोचो उस माँ का कलेजा जिसने एक बेटा आंदोलन में खोया। आज वो दूसरे बेटे के माथे पर दही-गुड़ का टीका लगाकर उसे भी परदेस भेजती है। उसकी आँखें पूछती हैं — बताओ वरुण, मेरा कौन सा गुनाह था? मैंने तो दोनों बेटे इस मिट्टी को दे दिए। यही है पहाड़ का मौन रूदन, जो दिल्ली को सुनाई नहीं देता।
पर यूकेडी का संकल्प सुन लो, ये शहीदों से वादा है:
- पानी पर पहला हक मेरी अम्मा का होगा, दिल्ली का नहीं।
- जवानी के लिए मूल निवास 1950 वापस लाएँगे। 80% रोजगार पहाड़ के बेटे का होगा। वरना ये कुर्सी भी छीन लेंगे।
- जमीन बचाने को ऐसा भू-कानून लाएँगे कि बाहरी आदमी यहाँ एक इंच जमीन को तरस जाए। हिमाचल से भी सख्त।
- गाँव फिर बसेंगे। हर आँगन में तुलसी फिर हँसेगी, हर चौखट पर फिर दिया जलेगा।
9 नवंबर को माला चढ़ाकर फोटो खिंचवाने से शहीदों का कर्ज नहीं उतरेगा। कर्ज तब उतरेगा जब पहाड़ का बेटा लौटकर अपनी माँ से कहे — माँ, अब मुझे कहीं नहीं जाना। मेरा भविष्य यहीं है।
सपना अधूरा है, पर साँस ले रहा है। वो हर उस शहीद की कब्र में धड़कता है जो रात को पूछता है — वरुण, मेरा बलिदान कब सार्थक होगा?
शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि नारों से नहीं, लौटते हुए बेटों से मिलेगी। अस्मिता बचेगी, तभी उत्तराखंड बचेगा। यूकेडी लड़ेगा, आखिरी खून की बूँद तक। रोते हुए पहाड़ को हँसाना है, बस यही मकसद है।
जय पहाड़। जय पहाड़ी। जय उत्तराखण्ड।































