Home ललिता कापड़ी जब व्यवस्था से प्रश्न पूछने वालों पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिए जाएँ…

जब व्यवस्था से प्रश्न पूछने वालों पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिए जाएँ…

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ललिता कापड़ी, हल्द्वानी

“राष्ट्र का भविष्य उन लोगों से सुरक्षित नहीं होता जो केवल सत्ता की प्रशंसा करते हैं, वह उन लोगों से सुरक्षित होता है जो समय रहते व्यवस्था की कमियों की ओर संकेत करने का साहस रखते हैं।”

“लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति बहुमत नहीं, बल्कि असहमति को सम्मानपूर्वक सुनने की संस्कृति है।”

शिक्षा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। इसलिए जब कोई शिक्षक, शिक्षाविद, वैज्ञानिक या सामाजिक कार्यकर्ता शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न उठाता है, तब उसके विचारों का उत्तर तथ्यों और नीतियों से दिया जाना चाहिए, न कि उसके व्यक्तित्व पर आरोप लगाकर।

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर एक राजनेता द्वारा सोनम वांगचुक के संबंध में ऐसा बयान दिया गया, जिसमें उनकी देशभक्ति और निष्ठा पर प्रश्न उठाए गए। यह केवल एक व्यक्ति पर लगाया गया आरोप नहीं था; इसने सार्वजनिक विमर्श की दिशा पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए। किसी लोकतांत्रिक राष्ट्र में विचारों का विरोध स्वाभाविक है, लेकिन किसी नागरिक की राष्ट्रभक्ति पर आरोप लगाना अत्यंत गंभीर विषय है और ऐसे आरोपों का मूल्यांकन तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही होना चाहिए।

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि सोनम वांगचुक कौन हैं, बल्कि यह है कि वे किस विषय पर बोल रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति शिक्षा में सुधार, युवाओं के भविष्य, परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पर्यावरण संरक्षण और नीति सुधार की बात कर रहा है, तो क्या हमारा पहला दायित्व उसके प्रश्नों को सुनना नहीं होना चाहिए?

इतिहास गवाह है कि समाज में बड़े परिवर्तन अक्सर उन्हीं लोगों ने शुरू किए हैं जिन्होंने व्यवस्था से कठिन प्रश्न पूछे। प्रश्न पूछना लोकतंत्र को कमजोर नहीं करता; प्रश्नों को दबाना लोकतंत्र को कमजोर करता है।

यह भी स्मरण रखना चाहिए कि सोनम वांगचुक वर्षों से शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करते रहे हैं। लद्दाख में वैकल्पिक शिक्षा मॉडल, स्थानीय युवाओं के कौशल विकास और जल संरक्षण जैसे कार्यों के लिए उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (2018) सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए हैं। उनके विचारों से असहमति हो सकती है, परंतु उनके तर्कों का उत्तर तर्कों से ही दिया जाना चाहिए।

“जब किसी राष्ट्र में व्यवस्था से बड़ा प्रश्न पूछने वाला व्यक्ति बन जाता है, तब समझ लेना चाहिए कि संवाद का स्थान आरोपों ने ले लिया है।”

आज आवश्यकता किसी व्यक्ति को नायक या खलनायक बनाने की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा जैसे राष्ट्रीय विषय को राजनीतिक शोर से मुक्त किया जाए। क्योंकि सरकारें बदलती रहती हैं, दल बदलते रहते हैं, विचारधाराएँ बदलती रहती हैं, लेकिन एक पीढ़ी का खोया हुआ भविष्य कभी वापस नहीं लौटता।

यदि शिक्षा पर उठे प्रश्नों का उत्तर राजनीति देगी, तो समाधान अधूरा रहेगा, लेकिन यदि उत्तर नीति, संवाद और संवेदनशीलता से मिलेगा, तो वही भारत के भविष्य की सबसे बड़ी जीत होगी।