Home Uncategorized अपनों की ‘कलह’ में उलझा 2027 का भविष्य

अपनों की ‘कलह’ में उलझा 2027 का भविष्य

38

बागेश्वर। जिले की राजनीति इन दिनों हमारे ऊंचे-नीचे पहाड़ी रास्तों से भी ज्यादा पेचीदा हो गई है। यहां की जनता अब केवल झंडों और नारों के पीछे नहीं भाग रही, बल्कि नेताओं के बदलते पाले और उनके ‘रिपोर्ट कार्ड’ को बारीक नजर से तौल रही है। 2027 की आहट के बीच बागेश्वर और कपकोट की सीटों पर हार-जीत के आंकड़ों से ज्यादा भविष्य की ‘अंदरूनी जंग’ के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं।

सुरक्षित सीट पर ‘अपनों’ की चुनौती

आरक्षित सीट होने के कारण यहां भाजपा के भीतर एक बड़ा द्वंद्व चल रहा है। स्वर्गीय चंदन राम दास की विरासत को संभाल रहीं विधायक पार्वती दास के सामने अब पार्टी के भीतर ही कई चुनौतियां हैं। 2022 के चुनावों में चंदन राम दास ने 32,211 मत पाकर जीत दर्ज की थी, लेकिन तब उनके सामने कांग्रेस से रंजीत दास थे जिन्हें 20,070 मत मिले थे और बसंत कुमार (आप प्रत्याशी के तौर पर) को 16,109 मत प्राप्त हुए थे। आज समीकरण बदल चुके हैं। रंजीत दास अब भाजपा के पाले में हैं, जिससे पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष की लहर है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने उपचुनाव में अपनी ताकत दिखाई जहां बसंत कुमार ने 30,842 मत पाकर भाजपा की जीत के अंतर को महज 2,405 वोटों पर समेट दिया। अब कांग्रेस में बालकृष्ण भी शामिल हो चुके हैं, जो पिछले चुनाव में निर्दलीय लड़कर 1,512 मत ले गए थे। बालकृष्ण अब कांग्रेस के भीतर टिकट के लिए जो छटपटाहट दिखा रहे हैं, उसने पार्टी हाईकमान की नींद उड़ा रखी है। साथ ही भैरव नाथ टम्टा जैसे निर्दलीयों की सक्रियता भी भाजपा-कांग्रेस दोनों के लिए यहां खतरा बनी हुई है। 

कपकोट विधानसभा- चार खेमों का संघर्ष और साख का सवाल

कपकोट की राजनीति हमेशा से दिलचस्प रही है, लेकिन वर्तमान में यहां भाजपा की अंदरूनी खींचतान चरम पर है। 2022 में सुरेश गढ़िया ने 31,275 मत पाकर जीत हासिल की थी और कांग्रेस के ललित फर्स्वाण को 27,229 मतों पर रोका था। लेकिन सुरेश गढ़िया के लिए राह अब उतनी आसान नहीं है। जहां नगर निकाय चुनाव में वे मजबूत दिखे, वहीं कपकोट ब्लॉक प्रमुख चुनाव में उन्हें बड़ी साख की हार झेलनी पड़ी। भाजपा का बहुमत होने के बावजूद वे अपनी पसंद का प्रमुख नहीं बनवा पाए, जिसने संगठन के भीतर उनके विरोध को उजागर कर दिया है। कपकोट में भाजपा अब चार बड़े खेमों में बंटी है। शेर सिंह गढ़िया और बलवंत सिंह भौर्याल के पुराने कैडर के साथ-साथ अब भूपेश उपाध्याय एक बड़े एक्स फैक्टर बनकर उभरे हैं। भूपेश उपाध्याय का राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है; वे बसपा के टिकट पर भी चुनाव लड़ चुके हैं और पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी से लड़कर 3,529 मत हासिल किए थे। उनके भाजपा में आने से पार्टी का वोट बैंक तो बढ़ा है, लेकिन टिकट की दावेदारी ने बाकी तीन खेमों की बेचैनी बढ़ा दी है। वहीं, कांग्रेस में ललित फर्स्वाण के सामने हरीश ऐठानी ने बड़ी लकीर खींच दी है। ऐठानी के बढ़ते जनसंपर्क ने कांग्रेस के भीतर भी ‘पुराना बनाम नया’ का मुकाबला खड़ा कर दिया है, जिससे 2027 की राह कांग्रेस के लिए भी आसान नहीं दिखती।

वर्चस्व की जंग में उलझी उम्मीदें

दोनों ही विधानसभाओं में जनता फिलहाल खामोश है, लेकिन पार्टियों के भीतर की यह ‘अंदरूनी कलह’ साफ सुनाई दे रही है। आंकड़ों का खेल बताता है कि बागेश्वर में कांग्रेस मजबूत हुई है और कपकोट में भाजपा खेमों में बंट गई है। 2027 का चुनाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन सी पार्टी अपने इन बिखरते चेहरों और नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को शांत कर पाती है। यहां जो अपनों को मना लेगा, वही जनता का विश्वास जीत पाएगा।