मान लीजिए, कल को आपके पेट में दर्द हो या आप थकावट से सड़क किनारे सुस्ता रहे हों, तो सावधान रहिएगा। बागेश्वर की गलियों में आजकल ऐसे ‘चमत्कारी’ यूट्यूबर घूम रहे हैं जिनके पास बिना छुए किसी का भी डीएनए टेस्ट करने की शक्ति है। ये वो महान विभूतियां हैं जो बिना डॉक्टर की रिपोर्ट के, सिर्फ चेहरा देखकर बता देते हैं कि आपने कौन सा नशा किया है और धुत होकर ऐसा किया है। इनके कैमरे की लेंस में शायद कोई ऐसा ‘दिव्य फिल्टर’ लगा है जो किसी भी सीधे-साधे पहाड़ी तेंदुए को पल भर में ‘आदमखोर नरभक्षी’ में बदल देता है। वन विभाग के अधिकारी तो बेचारे बेवकूफ हैं जो साक्ष्यों और पगमार्कों का इंतजार करते हैं, असली जांच तो इन यूट्यूबर्स के कमेंट सेक्शन में होती है जहां व्यूज के भूखे ये शिकारी अपनी सुई चुभाकर सनसनी का गुब्बारा फुला देते हैं। सबसे ‘प्रेरणादायक’ दृश्य तो तब होता है जब कोई बेचारा जिंदगी से हारकर पहाड़ की चोटी, नदी के भंवर और पुल के किनारे खड़ा हो। आम इंसान उसे बचाने दौड़ेगा, लेकिन हमारे ये डिजिटल शूरवीर अपना ‘ट्राइपॉड’ सेट करेंगे। क्योंकि भाई, किसी की जान बचे न बचे, चैनल की ‘रीच’ नहीं रुकनी चाहिए। मरते हुए आदमी से भी ये पूछ सकते हैं— “मरते वक्त आपको कैसा महसूस हो रहा है? जनता को बताइए। इन ‘महानुभावों’ के लिए न कोई कानून है, न कोई नैतिकता। इनके लिए समाज एक सर्कस है और हम सब उसके पात्र। किसी की इज्जत उछालना इनके लिए ‘कंटेंट’ है और किसी की मजबूरी इनके लिए ‘ब्रेकिंग न्यूज’। तो अगली बार जब आप ऐसे किसी ‘पत्रकार’ को देखें, तो समझ जाइएगा कि ये पत्रकार नहीं, बल्कि डिजिटल युग के वो कलाकार हैं जो आपकी संवेदनाओं की अर्थी पर अपनी लोकप्रियता का महल खड़ा कर रहे हैं।























