विधायक बनने के बाद अपने ही गांवों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाए ‘ नेताजी ‘
हल्द्वानी। वोट के लिए गरीब के झोपड़ी में शराब पहुंचाने वाले ने कभी गरीब की झोपड़ी में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पहुंचाने की कोशिश नहीं की, ना ही उस क्षेत्र की आवश्यकताओं की सुध ली जिससे पलायन को रोका जा सके और क्षेत्र का सर्वांगीण विकास हो सके। इसके विपरित सत्ता के गलियारों में बैठे जनप्रतिनिधियों के बुलंद भाषणों और वातानुकूलित कमरों में बैठकर विकास की रूपरेखा खींचने वाले अधिकारियों के दावों की अगर धरातल पर पोल खोलनी हो, तो पहाड़ो में बसे गांवों की पथरीली डगर पर एक बार चलना जरूरी है। जिला मुख्यालय से महज 10-15 किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव आज सिस्टम की उस संवेदनहीनता का जीता-जागता प्रमाण बन चुके है, जिसने एक संपन्न और खुशहाल बस्ती को श्मशान जैसी खामोशी में बदल दिया है। सड़क मार्ग से लंबा सफर तय करने के बाद जब एक किलोमीटर की वह उबड़-खाबड़ और जानलेवा चढ़ाई शुरू होती है, तो पैर थकने से पहले ही मन व्यवस्था की बेरुखी पर रोने लगता है। आजादी के दशकों बाद भी उत्तराखंड के गांव तक एक पक्की सड़क का न पहुंच पाना शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक बदनुमा दाग की तरह है। विडंबना देखिए कि जल जीवन मिशन के तहत हर घर के बाहर चमचमाते नल तो टांग दिए गए, लेकिन उन नलों से भी पानी अब टपकता नहीं दिख रहा। पहाड़ो की जवानी अब इस उबड़-खाबड़ रास्ते से हारकर शहरों की ओर पलायन कर चुकी है। कभी अपनी उन्नत खेती और पशुपालन के लिए विख्यात उत्तराखंड के गांवों की बाखलियां अब वीरान हो चुकी हैं और आंगनों में गड़े वे खूंटे आज भी व्यवस्था को चिढ़ा रहे हैं, जहां कभी दर्जनों भैंसें, बकरी और बैल बंधा करते थे। आज उन खूंटों पर केवल सन्नाटा और बुजुर्गों की मायूसी बंधी है। पेड़ों पर लदे रसीले संतरे, नींबू और माल्टे जमीन पर गिरकर सड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें सहेजने वाले हाथ अब शहरों की भीड़ में कहीं गुम हो चुके हैं। अधिकारी फाइलों में विकास की गंगा बहा रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि तीन किलोमीटर की स्वीकृत सड़क को महज दो मीटर वन पंचायत की जमीन के पेंच में फंसाकर पूरे गांव के अस्तित्व को ही दांव पर लगा दिया गया है। चुनाव के समय हाथ जोड़कर वोट मांगने आने वाले नेताओं ने आज तक इन गांवों की सुध लेना मुनासिब नहीं समझा। बीमार होने पर आज भी मरीज को कंधे या पीठ पर लादकर ले जाना पड़ता है और शाम ढलते ही तेंदुए के खौफ से ग्रामीण खुद को घरों में कैद कर लेते हैं। राज्य के कुछेक क्षेत्रों के ग्रामीणों ने तो पूर्व में भी दोटूक चेतावनी दे चुके हैं कि यदि उनके गांवों का विकास नहीं हो पाया तो वे अपने मतदान का उपयोग नहीं करेंगे। आने वाले समय में कुछेक गांवों में 2027 तक अगर उनकी मांगे पूरी नहीं की गयी तो मतदान का पूर्ण बहिष्कार करने की योजना भी बना रहे है। गांवों की यह मार्मिक तस्वीर चीख-चीखकर कह रही है कि केवल पाइप बिछाने और खंभे गाड़ने से गांव नहीं बचते, जब तक कि पहाड़ की दुर्गम चढ़ाइयों को सुगम सड़क का सहारा नहीं मिलता। विकास के तमाम खोखले वादे गांवों की इस पथरीली चढ़ाई पर आकर पूरी तरह दम तोड़ चुके हैं। शिक्षा का स्तर भी निम्न से निम्न होता जा रहा है। पहाड़ के गांवों में निवासरत धन बल से परिपूर्ण व्यक्ति भी सरकारी शिक्षा, स्वास्थ्य के अभाव में पलायन करने को मजबूर हैं। पहाड़ के गांव खाली होने से यहां जंगली जानवरों की आवाजाही भी तेज हो गयी। बन्दर, लंगूर, भालू, सुवर, तेंदूआ इत्यादि जानवर अब पहाड़ के गांवों में ग्रामीणों की कम हलचल से गांवों में आजादी से घूम रहे हैं। जो बचें खुचे ग्रामीण गांवों में रह रहे हैं वो भी धीरे-धीरे पहाड़ के गांवों को छोड़कर जिला मुख्यालय में किराये का भवन लेकर अपने नौनिहालों के भविष्य को उज्जवल बनाने की जुगत में लगे हैं। सरकार भी मतदाताओं को मतदान स्थल तक पहुंचाने के लिए पंचायत भवनों के निर्माण कार्यों में जुटी हुई है। जिन गांवों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जोड़ा जाना चाहिए था उन गांवों में सरकार पहुंच नहीं पा रहीं। शहरों का हाल पहाड़ो से भी बुरा है, यहां भी सरकार निजी शिक्षण संस्थान और निजी अस्पतालों की ब्रांडिंग कर रही है। खैर शहरों की खेती योग्य भूमि भी धीरे-धीरे कंक्रीट में बदल रही है।























