Home उत्तराखंड काला बाज़ारी : अधूरी जानकारी हमेशा अफवाह बन जाती है

काला बाज़ारी : अधूरी जानकारी हमेशा अफवाह बन जाती है

24
Oplus_131072

ललिता कापड़ी, हल्द्वानी उत्तराखंड


“मैंने सुना है 900 रुपये का सिलेंडर 3500 रुपये में मिल रहा है।”
“हाँ-हाँ भाई, ठीक सुना है।”
“क्या तुमने खरीदा?”
“नहीं, मैंने तो नहीं खरीदा। मेरी तो हिम्मत ही नहीं। इतने में तो चार सिलेंडर मिल जाएँगे। चूल्हे में लकड़ी जला लूँगा, पर 3500 का सिलेंडर नहीं ले सकता।”
“ग़ज़ब हो गया! कालाबाज़ारी की भी हद है। निकम्मी सरकार है, कोई एक्शन ही नहीं लेती। लूट मचा रखी है। सरकार के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी होनी चाहिए। ग़रीब इंसान क्या करेगा? वह तो फिर भी जंगल से लकड़ी बीन लाएगा, उसे चूल्हा जलाने की आदत है। पर मिडिल क्लास क्या करेगा? हर जगह वही मार खाता है…।”
“मैंने तो आज ही अपना सिलेंडर 933 रुपये में बुक कराया है।”
“सच में! पक्का तुम्हारी कोई जान-पहचान होगी। किसी ने तो बताया 3500 में मिल रहा है।”
“वो ‘किसी’ कौन है, ज़रा बताओगे?”
“अरे, मैंने कई लोगों को बोलते हुए सुना है… स्पष्ट नाम तो नहीं बता सकती। पर तुम्हें 933 का कैसे मिला?”
“अरे यार, मैंने तो गूगल पे से बुक किया। मैं तो हमेशा वहीं से करती हूँ। हाँ, दाम ज़रूर बढ़े हैं। पहले 875 में मिल जाता था। तुम भी एक बार करके देखो।”
“अच्छा! मैं तो टेंशन में आ गई थी। पर लोग 3500 क्यों बोल रहे हैं?”


आजकल दुनिया के कई हिस्सों में तनाव और युद्ध की स्थिति बनी हुई है—जैसे रूस-यूक्रेन और इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ता टकराव। इन संघर्षों की वजह से पूरे विश्व में अस्थिरता और चिंता का माहौल बना हुआ है।
तेल, गैस और खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों पर भी इसका असर पड़ रहा है। भारत में भी पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों, व्यापार और शेयर बाज़ार में इसका प्रभाव महसूस किया जा रहा है।
लेकिन जो लोग कह रहे हैं कि सिलेंडर 3500 रुपये में मिल रहा है, वे पूरी सच्चाई नहीं बताते।
और सच तो यह है—
“अधूरी जानकारी अक्सर अफ़वाह बन जाती है, और अफ़वाह सबसे तेज़ फैलने वाली आग होती है।”
सरकार ने व्यवस्था की है कि लोग कालाबाज़ारी से बच सकें। ऑनलाइन सिलेंडर बुकिंग की सुविधा है।
25 दिन पूरे होने के बाद 26वें दिन आप नया सिलेंडर बुक कर सकते हैं, और सामान्यतः 24 घंटे के भीतर वह आपके घर पहुँच जाता है। जिन क्षेत्रों में पाइपलाइन गैस की सुविधा है, वहाँ लोग ऑनलाइन बिल भी जमा कर सकते हैं। फिर भी सच्चाई यह है कि लगभग 80% जनता इन व्यवस्थाओं से पूरी तरह परिचित ही नहीं है और कुछ लोग हमारी इसी अज्ञानता का भरपूर फायदा उठाते हैं।
“जहाँ जानकारी कम होती है, वहाँ शोषण की संभावना सबसे ज़्यादा होती है।”
कायदे से देखा जाए तो चार सदस्यों के एक परिवार के लिए एक सिलेंडर 25 दिनों के लिए पर्याप्त होता है। कालाबाज़ारी प्रायः वहीं होती है जहाँ लोगों के नाम से वैध रजिस्ट्रेशन नहीं होते या फिर होटल-रेस्टोरेंट जैसे स्थानों पर ज़रूरत से अधिक सिलेंडर की माँग होती है। इसका नुकसान केवल आम जनता को ही नहीं, बल्कि सरकार और देश की अर्थव्यवस्था को भी होता है।
सच्चाई यह भी है कि इस समय तेल, डीज़ल और एलपीजी के दाम केवल भारत में ही नहीं बढ़े हैं। दुनिया के कई देश इससे प्रभावित हैं। परिस्थितियाँ कुछ हद तक आपातकाल जैसी ही हैं।
ऐसे समय में सबसे ज़रूरी है जागरूकता।
क्योंकि—
“संकट के समय इंसान का असली चरित्र सामने आता है—
कोई अवसर ढूँढता है,
कोई अफ़वाह फैलाता है,
और कोई समाज को जागरूक करता है।”
कुछ लोग कालाबाज़ारी कर अपनी जेब भरते हैं।
कुछ राजनीति कर जनता को गुमराह करते हैं।
कुछ लोग समाज में जागरूकता फैलाकर शांति और व्यवस्था बनाए रखने में मदद करते हैं।
और कुछ लोग ज़रूरतमंदों की सहायता करते हैं।
अब हमें यह तय करना है कि हम किस पंक्ति में खड़े हैं।
केवल सुनकर और पढ़कर किसी भी संदेश को आगे न बढ़ाएँ।
पहले समझें, रिसर्च करें, पूरी जानकारी प्राप्त करें—फिर लोगों तक पहुँचाएँ।
“जिम्मेदार नागरिक वही है, जो सूचना को परख कर आगे बढ़ाए, न कि बिना सोचे-समझे उसे फैलाए।”
आज के डिजिटल युग में, जहाँ लोग रील बनाकर पैसा कमा रहे हैं और हर कोई इन्फ्लुएंसर बनने की चाह रखता है, वहाँ यह भी ज़रूरी है कि हम इतना तो समझें कि अफ़वाह और सच्चाई में अंतर कैसे किया जाए। समस्याएँ तो हर रोज़ हमारे आसपास रहेंगी, लेकिन हमारा काम उन्हें अफ़वाह बनाकर फैलाना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक की तरह लोगों को जागरूक करना है और शांति व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग देना है।
ताकि जिन लोगों का इन वैश्विक संकटों से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है, वे कम से कम प्रभावित हों।
“समाज की सबसे बड़ी ताक़त जागरूक नागरिक होते हैं।”