ललिता कापड़ी
हल्द्वानी । वर्तमान समय में मनुष्य की आवश्यकताएँ जितनी बढ़ती जा रही हैं, जीवन उतना ही अधिक सुविधाओं से भरता दिखाई देता है। पर आश्चर्य यह है कि इस बढ़ती हुई लग्ज़री के बीच चीज़ें और संबंध दोनों ही सीमित होते जा रहे हैं। आज किचन में न तो बर्तनों की भीड़ है और न ही जीवन में रिश्तों की।दरअसल समय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि रिश्ते भी अब यूज़ एंड थ्रो की वस्तुओं जैसे होते जा रहे हैं। जितनी देर आवश्यकता रही, उतनी देर उनका उपयोग किया और फिर चुपचाप आगे बढ़ गए। एक समय था जब संबंधों को बुना जाता था—स्नेह के धागों से, विश्वास की गाँठों से और धैर्य की करघे पर यदि कहीं धागा ढीला पड़ जाता तो उसे फिर से कस दिया जाता, यदि कहीं टूट जाता तो उसे जोड़ने का प्रयास किया जाता। पुराने रिश्तों को उधेड़ कर फिर से नए रूप में बुन लेना भी एक कला थी।
आज समय बदल गया है।
यह रेडिमेड संबंधों का समय है।
यहाँ प्रयोग के बाद उन्हें सँभाल कर रखने या सुधारने की कोशिश नहीं होती, बल्कि सीधे रिन्यू की जगह रिप्लेस कर दिया जाता है। जैसे बाज़ार में हर महीने एक नया मॉडल आता है और पुराना अचानक अप्रासंगिक हो जाता है, वैसे ही कई संबंध भी अब उपयोगिता की कसौटी पर आँके जाने लगे हैं। जब तक उनसे कोई उद्देश्य जुड़ा है, वे महत्वपूर्ण हैं; उद्देश्य समाप्त होते ही उनका अस्तित्व भी धुँधला पड़ जाता है। धीरे-धीरे यह सिलसिला मनुष्य को उस मोड़ तक ले आता है जहाँ उसके चारों ओर लोग तो बहुत होते हैं, पर अपनापन कहीं दिखाई नहीं देता। भीड़ के बीच खड़ा व्यक्ति भीतर से उतना ही अकेला होता जाता है।
किसी ने सच ही कहा है—
“रिश्ते वस्तुएँ नहीं होते कि इस्तेमाल के बाद बदल दिए जाएँ,
वे वृक्ष की तरह होते हैं—जिन्हें समय, विश्वास और संवेदना से सींचना पड़ता है।”
और शायद इसी कारण—
“जिस मनुष्य के जीवन में एक भी ऐसा रिश्ता हो जो परिस्थितियों से बड़ा हो, वही वास्तव में जीवन का सबसे बड़ा सुखी व्यक्ति है।”
यदि आज के समय में भी आपके जीवन में कोई ऐसा संबंध है जो यूज़ एंड थ्रो की संस्कृति से ऊपर खड़ा है, तो समझ लीजिए कि आपने इस बदलती दुनिया में एक दुर्लभ धरोहर संभाल कर रखी है— एक ऐसा रिश्ता, जो समय के साथ पुराना नहीं होता, बल्कि और अधिक गहरा होता जाता है।























