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भीड़, भाषण और प्रतीकों के बीच अपना सच ढूंढती राजनीति

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धामी धाकड़ या धुरंधर वक्त बताएगा ?

हल्द्वानी । हल्द्वानी जनसभा में शब्द गूंजे—“जय श्री राम”… और राजनीति की भाषा फिर उसी पुराने मुहावरे में लौट आई, जहां आस्था और सत्ता का फासला धीरे-धीरे धुंधला होता जाता है।
राजनाथ सिंह आए और पुष्कर सिंह धामी को “धाकड़ से धुरंधर” बता गए। इस दौरान मंच सजा, भाषण हुए, तालियां बजीं… लेकिन सवाल वहीं खड़े रह गए क्या यह विकास की कहानी है या नारों की निरंतरता? यहां सवाल यह भी है कि भाजपा के लिए जय श्री राम का नारा आस्था का प्रतीक है या फिर महज एक चुनावी रणनीति? वैसे तो जय श्री राम भारतीय जनता पार्टी का एक स्थायी नारा बन चुका है “जय श्री राम शब्द पर सवाल यह है कि राम के साथ सीता हैं, हनुमान हैं, एक पूरा आदर्श है लेकिन राजनीति ने उस आदर्श को एक पंक्ति में समेट दिया है। वैसे भी चुनाव चाहे विधानसभा का हो या नगर निगम का चुनाव में मात्र मुद्दे बदलते हैं, नारा नहीं। जनसभा में मंच से उत्तराखंड को “देवभूमि” कहा गया आस्था, तप और परंपरा की भूमि कहकर संबोधित किया गया लेकिन उसी देवभूमि में शराब की नई दुकानों का विस्तार भी हो रहा है। यहां सवाल यह है कि क्या यह विकास का पैमाना है या सरकार के लिए राजस्व जुटाने की मजबूरी? इसके अलावा सवाल यह भी हैं कि शराब की नई दुकानों का विस्तार कुमाऊं में ही क्यों? गढ़वाल में क्यों नहीं? वजह साफ है गढ़वाल की जनता ने “नशा नहीं, संस्कार”को प्राथमिकता दी गढ़वाल के गांव खुदअपनी सामाजिक नीति लिख रहे हैं। टिहरी गढ़वाल के सुदाड़ा गांव ने शादी-ब्याह में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।जो उनकी सोच को दर्शाता हैं। यह सिर्फ एक फैसला नहीं, बल्कि एक संकेत है कि समाज और सत्ता की दिशा अलग-अलग भी हो सकती है। यहां गौर करने वाली बात यह भी हैं कि
हल्द्वानी में आयोजित इस रैली में भीड़ तो जुटी लेकिन यहां फिर सवाल पैदा होता है की जो भीड़ जुटी वह स्वत: आई थी या लाई गई थी? भीड़ जुटाने के लिए जिन संसाधनों का इस्तेमाल किया गया वह यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि क्या यह जनसमर्थन है या प्रशासनिक प्रबंधन? जब सरकार को भीड़ जुटानी पड़े, तो सवाल सिर्फ विपक्ष नहीं, हालात भी पूछते हैं।

आज की भाजपा पर आरोप लग रहे हैं कि वह “आया राम, गया राम” की राजनीति में फंसती जा रही है। मंत्रिमंडल में कई चेहरे वे हैं जो कभी विपक्ष में थे। यानी विचारधारा से ज्यादा महत्व अब संख्या को है। क्या सत्ता का रास्ता अब विचारों से नहीं, जोड़-तोड़ से बनता है? रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री धामी को धाकड़ से धुरंधर धामी बता गए यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा कि धामी धाकड़ हैं या धुरंधर लेकिन फिलहाल तस्वीर जो बया कर रही है उसके अनुरूप नारे वही हैं, समय के अनुरूप चेहरे बदलते रहते हैं, वही सरकार के दावे बड़े हैं, पर सवाल उससे भी बड़े है और राजनीति अब भी भीड़, भाषण और प्रतीकों के बीच अपना सच ढूंढ रही है।

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