जनता विकल्प चुनेगी, या फिर विकल्पों के भंवर में ही घूमती रहेगी?
हल्द्वानी। एक बार फिर उत्तराखंड की राजनीति में वही पुराना दृश्य उभर रहा है दो बड़े दल, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, और इनके बीच अपनी पहचान बचाने की कोशिश करता उत्तराखंड क्रांति दल। लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग है। वजह है असंतोष, फैसलों पर सवाल और जनता के मन में पलता एक तीसरा विकल्प। वही यू.जी.सी. बिल को लेकर जो विरोध सड़कों पर दिखा, वह सिर्फ विपक्ष का नहीं था। कहा गया कि भाजपा के अपने कार्यकर्ताओं में भी असहमति थी। यह एक संकेत है कि सत्ता के भीतर भी सब कुछ ठीक नहीं है और जब अपनी ही पंक्ति में दरार दिखे, तो विपक्ष को कुछ करने की जरूरत कम पड़ जाती है।

अंकिता हत्याकांड अब भी एक अनुत्तरित सवाल की तरह खड़ा है। जनता जानना चाहती है, वह वीआईपी कौन है? जवाब नहीं मिला। सीबीआई जांच भी तब आई जब दबाव बढ़ा। सवाल यह है कि क्या न्याय स्वतः होना चाहिए या फिर सड़कों पर उतरकर उसे मांगना पड़ेगा?
इसी बीच, छोटे दल की बड़ी बातें भी हैं। यूकेडी गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग दोहरा रही है। परिसीमन को लेकर उसका तर्क है अगर क्षेत्रफल आधार बने, तो पहाड़ बचेगा। वरना सीटें मैदान की ओर झुकेंगी, और पहाड़ फिर पीछे छूट जाएगा। दूसरी तरफ दल बदल की बात करें तो नई दिल्ली में कांग्रेस में शामिल हुए नेताओं की सूची लंबी है। पूर्व विधायक, पूर्व मेयर, पूर्व पदाधिकारी सब एक नई पारी की तैयारी में हैं। सवाल यह नहीं कि कौन आया, सवाल यह है कि क्यों आया?राजनीति में शामिल होना आसान है, लेकिन समय का चुनाव बहुत कुछ कह देता है। चुनाव नजदीक हो और नेताओं का रुख बदलने लगे, तो इसे रणनीति कहा जाता है या अवसरवाद यह जनता तय करती है। इसके अलावा पूर्व सी एम हरीश रावत के संन्यास की चर्चा भी हवा में है। अगर यह सच होता है, तो कांग्रेस के लिए यह अंत नहीं, एक नई शुरुआत की तरह पेश किया जा रहा है। लेकिन क्या सिर्फ चेहरे बदलने से राजनीति बदलती है?

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के फैसलों को लेकर असंतोष की बातें सामने आ रही हैं। यू.जी.सी. बिल इसका उदाहरण बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि इससे न सिर्फ आम जनता बल्कि पार्टी के कार्यकर्ता भी निराश हुए हैं। यहां सवाल यह है कि क्या सरकार अपने फैसलों की समीक्षा करेगी या फिर चुनाव तक इंतजार करेगी? इसी के साथ तीसरे विकल्प की भी बात सामने आ रही है। हालांकि उत्तराखंड की राजनीति में तीसरे विकल्प की बात नई नहीं है। लेकिन हर चुनाव में यह सवाल जरूर उठता है। इस बार भी फिर वही सवाल सुर्खियों में हैं कि क्या इस बार कुछ बदलेगा? वैसे पिछले 25 सालो का हिसाब सामने है। स्थायी राजधानी अब भी मुद्दा है। भू-कानून, मूलनिवास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य ये सब आज भी अधूरे सवाल हैं। पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं, लोग जा रहे हैं, और पीछे रह जाती है सिर्फ खामोशी। यूकेडी इन्हीं मुद्दों को लेकर मैदान में है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता इस बार राष्ट्रीय दलों से अलग सोच पाएगी? अंत में वही सवाल 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन बहस शुरू हो चुकी है। भाजपा और कांग्रेस अपनी-अपनी तैयारी में हैं। यूकेडी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। लेकिन असली सवाल राजनीति से नहीं, जनता से है। क्या वह इस बार विकल्प चुनेगी, या फिर विकल्पों के बीच ही घूमती रहेगी? क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता बदलना आसान है, सोच बदलना मुश्किल।



























