ललिता कापड़ी, हल्द्वानी
“धन्यवाद” शब्द में बहुत बड़ी ताकत होती है। इस ताकत का अंदाज़ा मुझे पहले कभी न था। पर जब से मैंने सीखा कि जीवन में उस प्रत्येक व्यक्ति को धन्यवाद बोलना सीखिए जिसका आपके जीवन को खूबसूरत बनाने में कण मात्र का भी योगदान है। “धन्यवाद” शब्द झुकने का प्रतीक नहीं बल्कि उस शक्ति का प्रतीक है जिसका हमें अंदाज़ा भी नहीं।
सर्वप्रथम तो यह शब्द हमारे भीतर के अहंकार को समाप्त करता है। जब जब हम धन्यवाद बोलते हैं तब तब यह ब्रह्मांड हमारे पक्ष में होने लगता है। यह बात मुझे तब समझ आई जब मेरे जीवन के लगभग 35 वर्ष बीत चुके थे। जब से मैंने अपने जीवन में इस शब्द को स्थान दिया है तब से मुझे यह महसूस होता है कि ईश्वर मेरे साथ खड़ा है।
क्योंकि बहुत से कार्य जो मैं कर रही होती हूँ वह मात्र मेरे मन की कल्पना होते हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा होता है कि कैसे होगा। लेकिन जैसे जैसे प्रयास करने लगती हूं बहुत सारे लोग ऐसे मिलने लगते हैं जिन्हें मैं पहले कभी नहीं जानती थी लेकिन वह मेरे कार्य को अंजाम देने के लिए उपस्थित होते हैं। मेरा कार्य सफ़लता पूर्वक बिना किसी विघ्न बाधा के पूर्ण हो जाता है। उस वक्त मुझे यह महसूस होता है जैसे ईश्वर उन सब के रूप में मेरे आसपास खड़ा है।
अक्सर अपने जीवन में कुछ अच्छे परिवर्तनों के लिए या कुछ अच्छा मिल जाने पर हम किसी को धन्यवाद देने में स्वयं को छोटा महसूस करते हैं या फिर यह सोचते हैं कि यह चापलूसी का प्रतीक है।
परन्तु नहीं! यह चापलूसी का प्रतीक नहीं बल्कि विनम्रता का प्रतीक है, कृतज्ञता का प्रतीक है। कई बार कुछ लोग यह भी कहते हैं कि हम ईश्वर के अलावा किसी के समक्ष झुकते नहीं। सुबह शाम उसका धन्यवाद अवश्य करते हैं। यह अच्छी बात है। परंतु क्या ईश्वर को हम देख पा रहे हैं। नहीं! क्योंकि वह एक अदृश्य शक्ति है। परन्तु वह शक्ति किसी न किसी रूप में तो हमारे लिए कार्य करती है। बस यही बात समझने वाली है। कुछ ऐसे लोग जीवन में मिल जाना जिनसे कोई रिश्ता नाता नहीं होता। परन्तु हर क़दम पर कोई न कोई साथ हो जाता है। तब ऐसा महसूस होता है जैसे ईश्वर ने ही उसे भेज दिया। कार्य स्वयं ही अपनी गति प्राप्त करता है और अपनी मंज़िल प्राप्त कर लेता है।
यह परिवर्तन मेरे जीवन में अचानक नहीं आया। कुछ वर्ष पहले तक मैं इन सब बातों को नहीं समझती थी। चूंकि डायरेक्टसलिंग मेरा निजी व्यवसाय है। हमारी मेंटर हैं डॉ सुरेखा भार्गव जी हैं। मैं अक्सर उन्हें सुनती हूँ। अपने हर वक्तव्य में वह एक बात ज़रूर बोलती हैं कि अपनी छोटी बड़ी उपलब्धि के लिए हर छोटे बड़े व्यक्ति को धन्यवाद बोलना सीखो। इससे आप छोटे नहीं होगे। बल्कि और अधिक मज़बूत होगे। वह कहती हैं एक बार नहीं हजार बार बोलो। देखना यह यूनिवर्स तुम्हारे लिए कार्य करना शुरू कर देगा। मैंने सोचा यह तो बहुत आसान है ऐसा किया जा सकता है। फ़िर स्कूल में भी तो हमारे टीचर हमें यही सीखाते थे “थैंक्यू बोलो”। तब इस शब्द की ताकत पता नहीं थी तब हम इसे केवल अच्छे आचरण का प्रतीक मानते थे। पर जैसे जैसे मैंने इस शब्द को ध्यान पूर्वक बोलना शुरू किया जादू सा परिवर्तन मेरे जीवन में होने लगा। “थैंक्यू सुरेखा मैम”! यह महत्वपूर्ण सीख देने के लिए।
कई बार हम यह समझते हैं कि हमारे मन में दूसरे के लिए आदर है बार बार बोलने की क्या जरूरत है। परंतु हमारे मन का आदर दूसरे के मन तक कैसे पहुंचेगा? यदि वह दूसरे के मन तक नहीं पहुंचा तो फ़िर ईश्वर तक कैसे पहुंचेगा? ईश्वर किसी न किसी रूप में सर्वस्व विद्धमान है इसलिए उन रूपों को ही धन्यवाद बोलने से हमारे मन की बात ईश्वर के मन तक पहुंच पाएगी।
इसलिए उस प्रत्येक व्यक्ति विशेष का धन्यवाद जो किसी न किसी रूप में मेरे कठिन समय में मेरा हाथ थाम लेता है।



























