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वन टू थ्री, स्टार्ट, बजाइंग डंका! : विष्णु नागर

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तो आज नरेन्द्र मोदी का डंका बजने का दिन है। अपना डंका वह खुद भी बजाने में उस्तादों के उस्ताद हैं और दूसरों से भी अपना डंका प्रतिदिन-प्रतिक्षण बजवाते रहते हैं। इस कारण डंका फट चुका है, मगर उसे बजाना और बजवाना छोड़ नहीं रहे हैं। आज तो इतना बजेगा, इतना बजेगा कि उसके चीथड़े उड़ जाएंगे, मगर भक्त और भगवान मिलकर हर चीथड़े को डंका मानकर बजाएंगे, क्योंकि यह डंके की कमजोरी है कि वह चीथड़े-चीथड़े हो गया, डंकेश्वर की नहीं। क्योंकि बारह साल से रोज अपना डंका बजाते-बजाते वे तो थके नहीं हैं, डंका ही थका है!

किसी शुभ दिन वह प्रधानमंत्री नहीं रहे, तो साथ में डंकों के चीथड़ों को समेट कर साथ ले जाएंगे और कोई सुने, न सुने, घर में बैठे-बैठे,खांसते-खंखारते हुए चीथड़े बजाएंगे। अपना मनोरंजन करेंगे और दूसरे हंस-हंस कर आनंदित होंगे।

जवाहरलाल नेहरू 15 अगस्त,1947 से देश के प्रधानमंत्री थे और 27 मई, 1964 तक रहे। 1947 से 1952 तक वह गैरकानूनी ढंग से प्रधानमंत्री नहीं थे। किसी ने इन पांच सालों पर कभी ऊंगली नहीं उठाई और जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ही नहीं, संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर भी उस पहले मंत्रिमंडल के सदस्य थे। इससे सिद्ध है कि नेहरू का उस समय उनका प्रधानमंत्री बनना भी संवैधानिक और जनमत सम्मत था, क्योंकि उनसे अधिक लोकप्रिय नेता, गांधी जी के अलावा कोई और था नहीं!

वह किसी तानाशाह की तरह उस पद पर नहीं बैठे थे। और आजादी मिलने के अगले दिन तो चुनाव करवाए नहीं जा सकते थे और जब करवाये गए, तो भारत की जनता ने 1947 के उस निर्णय की बार-बार पुष्टि की।

बहरहाल झूठ के निजाम में सब चलता है। वैसे विश्व इतिहास में 72 वर्ष से अधिक समय तक सत्ता में रहने के रिकार्ड भी मौजूद हैं। फ्रांस के लुई चौदहवें 72 वर्ष और 110 दिन तथा एलिजाबेथ द्वितीय 70 वर्ष 126 दिन साम्राज्ञी रहीं। आज भी रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन सन 2000 से कभी राष्ट्रपति और कभी प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता पर काबिज़ हैं और लगता है कि जीवित रहते, इसी तरह बने रहेंगे। एशिया-अफ्रीका में आज भी ऐसे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हैं, जो 46-47 साल से सत्ता में हैं।

महात्मा गांधी न कभी प्रधानमंत्री रहे, न राष्ट्रपति, मगर भारत और भारत से बाहर उन जैसा सम्मान आज तक किसी को नहीं मिला और कोई अपने डंके के चीथड़ों को कितना ही फटे स्वर में बजाता रहे, कितनी ही उछल-कूद मचाता रहे, वह उनकी जगह नहीं ले पाएगा। पद पर रहना बड़ी बात नहीं है और आज हम सब जानते हैं कि कैसे, किन ताकतों के बल पर, किस तरह के समझौतों और तिकड़मों से, हिंदू-मुस्लिम रिश्तों को तार-तार करते हुए भारत की अर्थव्यवस्था को गड्ढे में डालते हुए, झूठ की अलंबरदारी करते हुए,वे यह मुकुट धारण किये हुए हैं, जिसका डंका आज बजा रहे हैं।

इतिहास किस शासक ने कितने वर्ष शासन किया, इसका सम्मान नहीं करता, न वर्तमान कर रहा है। एक बार शिराजा बिखरता है, तो फिर बिखरता ही चला जाता है, हम यह महाराष्ट्र के बाद पश्चिम बंगाल में भी देख चुके हैं और आगे भी देखेंगे। इतिहास यह भी बता चुका है कि मुसोलिनी 23 साल सत्ता में रहा, मगर मारे जाने के बाद भी उसकी क्या दुर्गति हुई, सब जानते हैं। हर सत्ता और हर तानाशाह को लगता है कि वह और उसकी सत्ता अजर-अमर है। लोगों को बेवकूफ बनाने की जितनी हिकमतें वह जानता है, उससे पहले कोई नहीं जानता था!

अंत में वे ही बचते हैं, जिन्होंने अपना डंका नहीं बजाया, जिनका डंका हमेशा दूसरों ने ही बजाया। यह हर क्षेत्र के बारे में सही है। हिंदी साहित्य का उदाहरण लें, तो गजानन माधव मुक्तिबोध का डंका उनके जीते-जी नहीं बजा, मगर उनकी मृत्यु के बाद पिछले 63 साल से बज रहा है। और भी पीछे जाएं, तो गालिब और मीर का डंका आज भी अपने आप बज रहा है और पता नहीं कितनी और सदियों तक बजता रहेगा।संत कवियों के अनेक उदाहरण तो हैं ही! प्रेमचंद भी इसके उदाहरण हैं। उनकी मृत्यु के 90 वर्ष बाद भी उनका डंका बज रहा है।

पर कोई बात नहीं, अपना फटा हुआ डंका बजाओ, ताकि करोड़ों लोगों की चीखें और रुदन उसमें इतने गहरे डूब जाएं कि फिर कभी सुनाई न दें!

वन टू थ्री। स्टार्ट बजाइंग डंका।

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)