नेहा खत्री, जयपुर
ज़िन्दगी में जीतना किसी के लिए भी आसान नहीं होता,
जब तक इंसान संघर्षों से लड़ना और विपरीत परिस्थितियों में मुस्कुराना नहीं सीख लेता।
मैं दीया हूँ—तीन बहनों में मँझली। मेरी ज़िन्दगी की शुरुआत ही कठिनाइयों से हुई। जब मैं मात्र दो वर्ष की थी, तभी मेरे पिताजी का निधन हो गया। कुछ समय बाद माँ ने भी हमें दादा-दादी के साये में छोड़ दिया। अजमेर की गलियों में पली-बढ़ी मैं, आज भी अपनी दादी और बुआओं की आभारी हूँ, जिन्होंने कभी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी।
बचपन से ही जिम्मेदारियाँ मेरी साथी बन गईं। घर के कामकाज, दादाजी की सेवा, दूर से पानी लाना। इन सबके बीच मैंने सिलाई, बुनाई, पेंटिंग और ज्वेलरी डिजाइनिंग जैसे हुनर भी सीख लिए। पढ़ाई का शौक था, लेकिन परिस्थितियों के चलते मैं 12वीं कक्षा तक ही अपनी शिक्षा पूरी कर सकी। सत्रह वर्ष की उम्र में मेरी शादी हो गई। नए घर और नए माहौल के साथ मेरे जीवन में एक नई शुरुआत हुई। मेरे पति, नवीन जी, मेरे जीवन के सबसे बड़े सहारे बने। उन्होंने हर परिस्थिति में मेरा साथ दिया और मेरे सपनों को पंख दिए।
ससुराल की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन मेरे हौसले मजबूत थे। मैंने घर के कामों के साथ-साथ बाँधनी का काम शुरू किया, जहाँ तीन दिन की मेहनत के बदले मात्र 60 रुपये मिलते थे। मेहनत बहुत थी, लेकिन आमदनी कम। तब मैंने अपने पति से पार्लर और सिलाई का काम शुरू करने की इच्छा जताई।उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के मेरा साथ दिया। सिर्फ 180 रुपये के एक छोटे से बैनर के साथ मैंने अपने सपनों की शुरुआत की। धीरे-धीरे मेरा काम बढ़ने लगा। इसी दौरान मैं माँ बनी। शारीरिक कमजोरी और जिम्मेदारियों के बावजूद मैंने अपने काम को कभी नहीं छोड़ा।
समय के साथ मेरा पार्लर सफल होने लगा, लेकिन जीवन ने फिर एक कठिन परीक्षा ली। पारिवारिक कारणों से हमें अपना घर बेचना पड़ा। यह मेरे लिए बहुत बड़ा झटका था। चिंता और अनिश्चितता के बीच भी मेरे पति ने मेरा हौसला बनाए रखा।
हमने फिर से शुरुआत की। नई जगह, नई उम्मीदों के साथ। मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे सब कुछ फिर पटरी पर आने लगा। इसी बीच एक दिन खबर मिली कि हमारा पुराना घर फिर से बिकाऊ है। हमने हिम्मत जुटाई, कर्ज लिया और आखिरकार उस घर को दोबारा खरीद लिया। मरम्मत कर उसे नया रूप दिया। ठीक वैसा, जैसा मैंने अपने सपनों में देखा था।
आज वह घर सिर्फ एक मकान नहीं, बल्कि मेरे संघर्ष, मेरी मेहनत और मेरे आत्मविश्वास का प्रतीक है।
मेरी ज़िन्दगी ने मुझे यही सिखाया है—
अगर आपके इरादे मजबूत हों, मेहनत सच्ची हो और हिम्मत अडिग हो,
तो कोई भी परिस्थिति आपको आपके लक्ष्य तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।
(दीया के बारे में)
दीया एक स्व-निर्मित उद्यमी हैं, जिन्होंने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने हौसले और मेहनत से एक सफल पार्लर व्यवसाय स्थापित किया।



























