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स्त्री, प्रेम और समर्पण का सत्य

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ललिता कापड़ी, हल्द्वानी

“स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति उसका प्रेम है” और सबसे बड़ी त्रासदी तब होती है जब वही प्रेम उसके विरुद्ध प्रयोग होने लगे।”

औरत की सबसे बड़ी मूर्खता शायद यही है कि वह यह मान बैठती है कि अपने प्रेम, त्याग और समर्पण से किसी पुरुष को या पूरे परिवार को बदल सकती है। जबकि सत्य यह है कि प्रेम और समर्पण केवल उसी मनुष्य को बदल सकते हैं जिसे इन दो शब्दों का महत्व पता हो, जिसे इन भावनाओं का मान रखना आता हो। जिस व्यक्ति के भीतर संवेदना ही नहीं, वहां प्रेम केवल उपयोग बनकर रह जाता है और समर्पण धीरे-धीरे शोषण में बदल जाता है। इतिहास गवाह है कि स्त्री के अथाह प्रेम और पूर्ण समर्पण के बावजूद भी पुरुषों ने अनेक स्त्रियों से प्रेम, सेवा, समर्पण और स्वीकार्यता की अपेक्षा रखी है। स्त्री अपने प्रेम के भ्रम में धीरे-धीरे वहां पहुंचा दी जाती है जहां से लौटना उसके लिए आसान नहीं रह जाता। अधिकतर पुरुषों के लिए आज भी स्त्री, हार और जीत का विषय अधिक है, एक संवेदनशील आत्मा कम। ऐसे समय में यदि कोई पुरुष एक स्त्री से प्रेम करने के बाद दूसरी स्त्रियों की ओर आकर्षित न हो, अपने प्रेम में ईमानदार रहे, तो वह वास्तव में दुर्लभ है। यदि ऐसा पुरुष किसी स्त्री के जीवन में है, तो वह स्त्री भाग्यशाली है और उससे भी अधिक सौभाग्यशाली वह पुरुष है, जिसे ईश्वर ने ऐसा विवेक, ऐसी निष्ठा और ऐसा हृदय दिया है।

“निष्ठा केवल संबंध निभाने का गुण नहीं, बल्कि चरित्र की सबसे ऊँची अवस्था है।”

स्त्री ने सदियों से पुरुष को और उसके लिए किए जाने वाले श्रृंगार को अपने जीवन का केंद्र माना है। इसी कारण राजपाठ, गहने, वैभव, सुरक्षा और मान-सम्मान के नाम पर उसे लुभाना आसान रहा। क्योंकि उसके बाहर की दुनिया केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक रूप से भी अत्यंत कठोर रही है। यह कठोरता इतनी गहरी है कि अनेक स्त्रियां चुपचाप भीतर ही भीतर वे प्रताड़नाएं सहती रहती हैं जो बाहर दिखाई ही नहीं देतीं और कई बार दिखाई देने पर भी समाज उन्हें अनदेखा कर देता है। जो स्त्रियां उस पीड़ा को पहचानने और सहने की शक्ति रखती हैं, वे अधिक समय तक वहां रुक नहीं पातीं जहां उन्हें धोखे की गंध आने लगती है। क्योंकि आत्मा, देर-सवेर, असत्य को पहचान ही लेती है। प्रेम स्त्री का मूल स्वभाव है। जहां प्रेम है, वहां श्रृंगार है। जहां अपनापन है, वहां सौंदर्य स्वतः जन्म लेता है, लेकिन विडंबना यह रही कि स्त्री को यह विश्वास दिला दिया गया कि उसका प्रेम, उसका श्रृंगार, उसका सौंदर्य सब किसी पुरुष के लिए है। मानो उसका अस्तित्व स्वयं में पूर्ण नहीं, किसी और की स्वीकृति पर निर्भर हो। जबकि सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है।प्रेम और श्रृंगार स्त्री के स्वाभाविक गुण हैं। उन्हें किसी आधार, किसी अनुमति, किसी पुरुष की आवश्यकता नहीं। वे उसकी आत्मा की अभिव्यक्ति हैं, उसकी जीवंतता का उत्सव हैं।

“स्त्री जब स्वयं के लिए मुस्कुराना सीख लेती है, तभी संसार उसकी मुस्कान का अर्थ समझता है।”

समाज ने इतनी गहराई से यह धारणा स्त्रियों के भीतर भर दी कि अकेली स्त्री के श्रृंगार पर प्रश्न उठने लगे। अकेली स्त्री के प्रेमगीतों पर तंज कसे जाने लगे।और दुखद यह है कि कई बार यह प्रश्न और तंज स्वयं स्त्रियों की ओर से आए। प्रेम यदि छुपाया जाने लगे, या किसी को प्रेम छुपाने के लिए मजबूर किया जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि वहां प्रेम से अधिक भय, स्वार्थ या पाप उपस्थित है। सच्चा प्रेम कभी छुपने की आवश्यकता महसूस नहीं करता। वह सम्मान देता है, स्वीकार करता है, और सबसे पहले व्यक्ति के अस्तित्व को सुरक्षित बनाता है। स्त्रियों को प्रेम, समर्पण और श्रृंगार त्यागने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें त्यागना है तो केवल उस आधार को त्यागना है जहां उनका अस्तित्व शून्य कर दिया जाता है। उन्हें यह समझने की आवश्यकता है कि प्रेम उनकी कमजोरी नहीं, उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। समर्पण उनका पतन नहीं, उनका सौंदर्य है। श्रृंगार किसी को आकर्षित करने का माध्यम नहीं, बल्कि उनके भीतर के जीवंत स्त्रीत्व की अभिव्यक्ति है। आवश्यकता केवल इतनी है कि वे इतनी मजबूत बनें कि उनका प्रेम और समर्पण गलत हाथों में व्यर्थ न जाए।और जिस क्षण उन्हें यह आभास होने लगे कि उनकी भावनाओं का मूल्य नहीं है, उसी क्षण वे स्वयं को वहां से अलग कर सकें।

“जहां प्रेम आपका अस्तित्व मिटाने लगे, वहां रुकना त्याग नहीं, आत्म-अपमान है।”

स्त्री को स्वयं को हीन दृष्टि से देखने की नहीं, स्वयं के मूल्य को पहचानने की आवश्यकता है। क्योंकि प्रेम, समर्पण और संवेदना जैसी शक्तिशाली भावनाएं हर किसी को नहीं मिलतीं। इसलिए आवश्यक है कि इन भावनाओं का निवेश सही व्यक्तित्व, सही संबंध और सही स्थान पर हो। जहां प्रेम बोया जाए, वहां सम्मान उगे। जहां समर्पण दिया जाए, वहां विश्वास लौटे और जहां स्त्री अपना हृदय रखे, वहां उसका अस्तित्व सुरक्षित रहे।