आखिरकार 25 साल हो ही गए। 7 अक्टूबर 2001 को जो यात्रा गांधीनगर से शुरू हुई थी, वह 2026 तक दिल्ली के दिल में अचल संपत्ति बन चुकी है। इस ऐतिहासिक अवसर पर बधाई तो बनती है – विपक्ष को छोड़कर पूरे देश को। 25 साल में बहुत कुछ बदला है। पहले नेता भाषण में रोजगार की बात करते थे, अब मोदी जी ने हमें सिखा दिया कि रोजगार मांगना भी एक तरह का राष्ट्रद्रोह है। पकौड़ा तलना भी तो रोजगार है। पहले हम विकास के लिए सड़क-मापते थे, अब हम व्हाट्सएप पर विकास महसूस करते हैं। यह भी एक प्रगति है।
गुजरात मॉडल से हमने सीखा कि कैसे 24 घंटे बिजली दी जा सकती है, और राष्ट्रीय मॉडल से सीखा कि कैसे 24 घंटे कैमरा ऑन रखा जा सकता है। पहले योजना आयोग गरीबी हटाने की योजना बनाता था, अब गरीब ही आंकड़ों से हटा दिए गए हैं। कितना सुगम समाधान है। विदेश नीति में तो कहना ही क्या। पहले प्रधानमंत्री विदेश जाते थे तो समझौते लाते थे, अब जाते हैं तो रील लाते हैं। दुनिया आज भारत को जानती है – “वो देश जहाँ सब कुछ ठीक है” वाले भाषण से। और सबसे बड़ी उपलब्धि – हमने 25 साल में जनता को एक कुशल दर्शक बना दिया है। जनता अब सवाल नहीं पूछती, ताली बजाती है। महंगाई पर ताली, बेरोजगारी पर ताली, पेपर लीक पर ताली। लोकतंत्र में इससे अधिक अनुशासित जनता और क्या चाहिए?
विपक्ष का क्या है, वह तो 25 साल से एक ही राग अलाप रहा है – संविधान, संस्थाएं, महंगाई, बेरोजगारी। उन्हें कौन समझाए कि यह 2014 से पहले के मुद्दे थे। नया भारत अब इन पुरानी बातों से ऊपर उठ चुका है। यहाँ अब मुद्दा है – आज शाम कौन सा इवेंट है, किसका बहिष्कार करना है, और किस चैनल पर किसकी धुलाई चल रही है। खैर, 25 साल का अनुभव कम नहीं होता। इतने लंबे समय तक सत्ता में रहकर भी खुद को विपक्ष जैसा पीड़ित दिखाए रखना, यह भी एक कला है और इस कला के एकमात्र कलाकार को सलाम तो बनता है।


































