अब ED की एंट्री और फेसबुक वाली फटकार
उत्तराखंड की राजनीति में दो जुमले स्थायी हो गए हैं। एक पुराना – “रावत मॉडल”, दूसरा नया – “धामी मॉडल”।
2016 में हरीश रावत का कथित स्टिंग – “मैं आँखें बंद कर लूँगा” – भाजपा ने “रावत मॉडल” बना दिया। उसी 2016 की एक और फाइल अब फिर खुली है – UKSSSC की VPDO परीक्षा 2016।
ताजा कार्रवाई में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पूर्व OSD और वर्तमान PA चंदन सिंह जीना के देहरादून स्थित आवास पर छापेमारी की। एजेंसी के अनुसार वहां से 32 लाख रुपये की अघोषित नकदी, 200.5 ग्राम सोना (13 सोने के सिक्के, 7 चेन) और 12 लग्जरी घड़ियां (Rolex, Rado, Piaget समेत) बरामद हुईं, और परिवार के खातों में 52.16 लाख का बैलेंस फ्रीज किया गया। कुल जब्त/फ्रीज संपत्ति का मूल्य लगभग 1.28 करोड़ आंका गया है। इस कार्रवाई के बाद हरीश रावत ने संगठन के पदों से इस्तीफे की पेशकश की है। अब सवाल है – अगर वो रावत मॉडल था तो ये क्या है? यही है धामी मॉडल।
धामी मॉडल का असली चेहरा : फटकार फेसबुक पर, फाइल पर प्यार
धामी मॉडल की सबसे बड़ी पहचान है – बेलगाम नौकरशाही। यहाँ अधिकारियों को मुख्यमंत्री अपने फेसबुक वॉल पर खूब फटकारते हैं, लाइव आकर लताड़ते हैं, पर उनकी लापरवाही पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती जो अन्य अधिकारियों के लिए मिसाल बने। नतीजा? रस्सी जल गई पर ऐंठन नहीं गई। एक अधिकारी को फटकार लगी, दूसरे दिन वो फिर उसी मलाईदार कुर्सी पर। न वेतन कटा, न तबादला, न सस्पेंशन। ऊँची दुकान फीका पकवान – प्रचार करोड़ों का, कार्रवाई सिफर।
आज नौकरशाही की हालत अंधेर नगरी चौपट राजा जैसी है। कोई RSS का चहेता, कोई भाजपा नेताओं का करीबी, कोई मंत्री-विधायक की सिफारिश पर तो कोई अन्य की आड़ लेकर पोस्टिंग ले रहा है। सब अपनी-अपनी डफली अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। जनमुद्दों पर कोई हाथ-पैर हिलाने को तैयार नहीं।इसका सबसे बड़ा सबूत है ननूरखेड़ा शिक्षा निदेशालय। शारीरिक शिक्षा प्रशिक्षित बेरोजगार 104 दिन से अनिश्चितकालीन धरने पर और 89 दिन से क्रमिक अनशन पर हैं। नई शिक्षा नीति कहती है हर स्कूल में शारीरिक शिक्षक अनिवार्य, पर फाइल संख्या 77006 आज भी बाबुओं की मेज पर कैद है। सरकार कागजी घोड़े दौड़ा रही है और युवा सड़क पर हैं। दूसरा मामला उत्तराखंड के संविदा/आउटसोर्स/दैनिक वेतन आदि कर्मचारियों से जुड़ा हुआ है जिसमें सरकार हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी सम्मान कार्य का सम्मान वेतन देने से गुरेज करती नजर आई है।
सार यही है – रावत मॉडल में भ्रष्टाचार का लाइसेंस चोरी-छिपे दिया गया था, धामी मॉडल में वह लाइसेंस फेसबुक लाइव पर फटकार के साथ खुलेआम बंट रहा है। जब तक फटकार कार्रवाई में नहीं बदलेगी, तब तक कहावत वही रहेगी – खोदा पहाड़, निकली चुहिया।
वे सवाल जिन पर सरकार मौन है
राज्य की सम्पत्तियों से प्राप्त आय कहां गयी? धामी सरकार ने मीडिया पर अरबों रुपये क्यों खर्च किए? सरकारी विभाग घाटे में क्यों जा रहे हैं और उनका प्रॉफिट कहां गया? कर्ज का पैसा किस मद में खर्च हुआ? मुख्यमंत्री राहत कोष का पैसा अपनों पर क्यों लुटाया गया? टैक्स देने वाली जनता को सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य में बेहतर सुविधा क्यों नहीं मिल रही? जनता के विरोध के बावजूद टर्मिनल क्यों बनाए जा रहे हैं और यूजीसी क्यों थोपा जा रहा है? ग्लेशियर क्यों पिघल रहे हैं, शिकायतों का समय पर निस्तारण क्यों नहीं हो रहा? धामी सरकार जिस दिन सत्ता में आई थी उस दिन की स्थिति और आज की स्थिति में क्या फर्क है? कर्ज में डूबे प्रदेश में राज्य मंत्रियों के बीच विभागों की बंदरबांट क्यों? राज्य के कारोबारियों को छोड़कर अन्य प्रदेशों के कारोबारियों को प्राथमिकता क्यों? सरकारी रोजगार पर अन्य प्रदेशों के युवाओं को प्राथमिकता क्यों? गैरसैंण को राजधानी न बना पाने का कारण? मूल निवास, भू-कानून पर काम क्यों नहीं? सरकारी परिसम्पतियों की अवैध बंदरबांट ?सरकार के हर फैसले पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को क्यों दखल देना पड़ रहा है? इन सवालों का संतोषजनक उत्तर न मिल पाना ही बताता है कि भ्रष्टाचार चरम पर है।
विपक्ष भी मौन
चुनाव नजदीक आते ही विपक्ष रोजगार, स्थायी राजधानी, मूल निवास, सरकारी शिक्षा-स्वास्थ्य जैसे जनमुद्दों पर बहस करने के बजाय जातिगत राजनीति में उलझा है। उसका काम सिर्फ अपने मुखिया के लिए आवाज उठाना रह गया है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जो नेता कल तक कांग्रेस छोड़ भाजपा में गए, फिर वापस कांग्रेस में आए, वही आज नेता प्रतिपक्ष हैं। जनता अब सब समझती है, इसीलिए कह रही है – पक्ष-विपक्ष एक ही है, फर्क सिर्फ पार्टी के नाम का है। पुष्कर सिंह धामी ने कुमाऊं से तीन विधायकों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया, मजे की बात यह है कि तीनों विधायक कांग्रेस से भाजपा में गए थे। इसी से साबित होता है कि फर्क सिर्फ जनता के साथ-साथ अपने कार्यकर्ताओं को गुमराह कर सत्ता हथियाना है। किसी ने सच ही कहा – सुबह मैंने जिस पार्टी के मुर्दाबाद के नारे लगाए शाम होते ही उसी दल की जयजयकार करनी पड़ रही है।
बहरहाल, अगर कांग्रेस के समय का वह कथित भ्रष्टाचार “रावत मॉडल” था, तो मौजूदा धामी सरकार का शासन उससे भी दो कदम आगे निकल चुका है।































