Home उत्तराखंड विश्वास की हत्या

विश्वास की हत्या

973

ललिता कापड़ी, ( उत्तराखंड )

एक सामान्य परिवार का व्यक्ति था। वह जितना भी कमाता, उसका दस प्रतिशत समाजसेवा के लिए अलग रख देता। कभी किसी बीमार की दवा के लिए, कभी किसी भूखे के भोजन के लिए। कई बार लोग उसकी मदद लौटाते, कई बार नहीं। लेकिन उसने कभी हिसाब नहीं रखा। लगभग तीस वर्षों से वह इसी तरह निःस्वार्थ सेवा करता आ रहा था।

एक दिन उसके मित्र से मिलने एक व्यक्ति आया। बातचीत के दौरान समाजसेवी का जिक्र हुआ तो वह व्यक्ति हँसकर बोला, “ऐसे भोले इंसान को तो कोई भी आसानी से बेवकूफ बना सकता है।”

मित्र ने कहा, “वे साठ वर्ष के हैं और तीस वर्षों से सेवा कर रहे हैं। अनुभवहीन नहीं हैं।” दोनों के बीच पाँच सौ रुपये की शर्त लग गई। वह व्यक्ति समाजसेवी के पास पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला, “बाबूजी, मेरा बेटा छत से गिर गया है। बहुत चोट आई है। मेरे पास एक भी रुपया नहीं है। छह सौ रुपये की जरूरत है, कृपया मदद कर दीजिए।”

समाजसेवी ने बिना कोई सवाल किए तुरंत छह सौ रुपये निकालकर उसके हाथ पर रख दिए। वह व्यक्ति शर्त जीतकर मित्र के पास गया, लेकिन कुछ ही देर बाद उसका मन बदल गया। वह वापस आया और सारी सच्चाई बता दी।

समाजसेवी की आँखों में पीड़ा उतर आई। उन्होंने कहा, “तुमने मेरे छह सौ रुपये नहीं लिए, तुमने मेरे तीस वर्षों के विश्वास को चोट पहुँचाई है। यदि गलती हो भी गई थी तो पैसे बाद में लौटा देते। सच बताकर तुमने मेरी सेवा की भावना ही तोड़ दी।”

उन्होंने गहरी साँस ली और कहा- “आज से मैं समाजसेवा बंद कर रहा हूँ।” उस दिन छह सौ रुपये की नहीं, एक इंसान के विश्वास की हत्या हुई थी