देहरादून । उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होते ही सत्ताधारी भाजपा सरकार निशाने पर है। जिस प्रदेश में अधिकारी यूट्यूब पर सक्रिय दिखें और विकास नेताओं के भाषणों तक सीमित रह जाए, वहां की जनता सवाल पूछ रही है सरकार किसका विकास कर रही है? हाल ही में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री समेत भाजपा के कई बड़े चेहरे उत्तराखंड पहुंचे। इन दौरों की सुर्खियां तो बनीं, पर विपक्ष और स्थानीय हलकों में एक सवाल गूंज रहा है कि इन आवभगत और आवाजाही का खर्च आखिर किसके खाते से गया? जब भी कर्मचारियों, आशा कार्यकर्ताओं या विकास के मुद्दे उठते हैं, तो चर्चा का रुख केंद्र के नेताओं की तरफ मोड़ दिया जाता है।
राहत कोष से लेकर रोजगार तक आरोप
सबसे बड़ा विवाद मुख्यमंत्री राहत कोष को लेकर सामने आया है। आर.टी.आई. से मिली जानकारी के हवाले से दावा किया जा रहा है कि खटीमा और चम्पावत में राहत कोष का लाभ सबसे ज्यादा भाजपा कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को मिला। आलोचकों का कहना है कि इससे साफ संकेत मिलता है कि सीएम धामी इस बार भी इन्हीं सीटों में से किसी एक से चुनावी मैदान में उतर सकते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और युवाओं के रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों पर भी सरकार को घेरा जा रहा है। आरोप है कि सरकारी तंत्र बदहाल है, पहाड़ों से पलायन जारी है और भ्रष्टाचार चरम पर है। सड़कों का जाल बिछने का श्रेय भी आलोचक केंद्र सरकार की योजनाओं को दे रहे हैं।
हिन्दुत्व बनाम ज़मीनी मुद्दे
देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में सीएम धामी के हिंदुत्व के एजेंडे पर भी बहस छिड़ी है। आलोचकों का कहना है कि हर दो कदम पर देवी-देवता वाले इस प्रदेश में भी हिंदुत्व का नारा लगाकर असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है। बहरहाल चुनावी अटकलों का बाजार गर्म है। कहा जा रहा है कि धामी रुद्रपुर, खटीमा, चम्पावत या डीडीहाट से लड़ सकते हैं, तो कुछ लोग उनकी पत्नी के चुनावी डेब्यू की भी चर्चा कर रहे हैं। 2027 भाजपा के लिए आसान नहीं माना जा रहा क्योंकि जनता अब पूछेगी कि हवाई यात्राओं, केंद्रीय नेताओं के स्वागत और प्रचार पर खर्च हुआ सरकारी धन का हिसाब कौन देगा? गांव स्तर पर भी सियासी समीकरण बदलते दिख रहे हैं ग्राम प्रधान और क्षेत्र पंचायत बड़ा है या भाजपा कार्यकर्ता, इसका फैसला भी इसी चुनाव में होगा। फिलहाल जनता के पास ही है अंतिम जवाब मुख्यमंत्री राहत कोष किसके लिए बना था और विकास के दावे हकीकत में कितने उतरे ?






























