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उत्तराखण्ड में ST दर्जे की मांग बुलंद

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एकता मंच ने बुलाई अहम बैठक

पिथौरागढ़। चीन-नेपाल सीमा से सटे संवेदनशील उत्तराखण्ड में अब पर्वतीय मूल निवासियों को संवैधानिक सुरक्षा कवच दिलाने की मांग ने नया जोर पकड़ लिया है। उत्तराखण्ड एकता मंच ने सोमवार को देहरादून के हिमालयन अध्ययन केंद्र में इस मुद्दे पर नगर के प्रमुख बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और पत्रकारों की गोलमेज बैठक बुलाई।

बैठक में उत्तराखण्ड क्रांति दल के संरक्षक एवं पूर्व विधायक काशी सिंह ऐरी सहित पूरी टीम मौजूद रही और मंच ने इस मांग को अपना खुला समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि यह “यह सिर्फ आरक्षण की लड़ाई नहीं” बल्कि अपने अधिकारों की लड़ाई भी है। वहीं एकता मंच के प्रतिनिधियों ने कहा कि भारत के 12 हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मूल निवासियों को पहले से ही जनजाति का दर्जा और 5वीं-6वीं अनुसूची जैसी संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है। लेकिन उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों के मूल निवासी अब भी इससे बाहर हैं। मंच का कहना है कि यह मांग केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चीन-नेपाल सीमा से लगे राज्य की आंतरिक सुरक्षा, जनसांख्यिकी संतुलन और हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण से सीधे जुड़ी है। इस बैठक में रखे गए प्रस्ताव पत्र के अनुसार, यदि पर्वतीय मूल निवासियों को ST दर्जा और 5वीं अनुसूची का कवच मिलता है तो उत्तराखण्ड को निम्न लाभ मिल सकते हैं –

रोजगार और शिक्षा में आरक्षण

केंद्र व राज्य की नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 7.5% ST कोटा मिलेगा। जल-जंगल-जमीन आधारित संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण से लगभग 5 लाख मूल निवासियों के लिए प्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का अनुमान है।

मूल निवासी 1950 और सख्त हूं कानून

बाहरी हस्तक्षेप से बढ़ रहे जनसांख्यिकी असंतुलन और सीमांत गांवों की सुरक्षा को देखते हुए “मूल निवास 1950” की तिथि तय करने और हिमाचल की धारा 118 जैसे देश के सबसे सख्त भू-कानून लागू करने की मांग उठी।

भाषा और संस्कृति संरक्षण

गढ़वाली और कुमाऊँनी को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने और इन्हें पर्वतीय स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया।

महिला सुरक्षा और किसान अधिकार

ST एक्ट लागू होने से महिलाओं को अतिरिक्त कानूनी सुरक्षा मिलेगी। वहीं वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत भूमिहीन किसानों को वन भूमि पर कृषि पट्टा मिल सकेगा, जैसा हिमाचल के लाहौल-स्पीति और किन्नौर में लागू है।

ग्राम सभा को अधिकार

जल-जंगल-जमीन पर फैसले अब ग्राम सभा करेगी, न कि नेता-अधिकारी। इसके तहत ग्राम सभाओं को केंद्र-राज्य से सीधा फंड मिलेगा और अपने क्षेत्र में पूर्ण शराबबंदी लागू करने का कानूनी अधिकार भी होगा।

वन्यजीव संघर्ष में कमी

स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ने से वन विभाग की कार्रवाई तेज होगी और रैपिड रिस्पॉन्स टीम के जरिए मानव-वन्यजीव संघर्ष का त्वरित समाधान संभव होगा।

हिमाचल मॉडल पर जोर

बैठक में वक्ताओं ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में लागू भू-कानून और ट्राइबल सुरक्षा व्यवस्था उत्तराखण्ड के लिए एक व्यावहारिक मॉडल हो सकती है। मंच ने संकेत दिया कि इस मांग को लेकर आने वाले हफ्तों में राज्यव्यापी जनजागरण अभियान शुरू किया जाएगा। उत्तराखण्ड एकता मंच अब इस प्रस्ताव को राज्य सरकार के माध्यम से केंद्र तक पहुंचाने की तैयारी में है।