“संस्मरणात्मक श्रद्धांजलि “
“जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हमें अक्सर किसी मुलाकात के आख़िरी होने का पता तब चलता है, जब वह बीत चुकी होती है।” 31 अगस्त… दिन बिल्कुल सामान्य था। हल्द्वानी की भागती-दौड़ती दोपहर, अपने कामों में उलझा हुआ जीवन और हमारे मन में भी ऐसा कोई विचार नहीं था कि उस दिन होने वाली एक छोटी-सी मुलाकात आने वाले दिनों में हमारी स्मृतियों का सबसे भावुक अध्याय बन जाएगी। आशा जी पिछले कई महीनों से अपने व्हाट्सऐप हैक होने की समस्या को लेकर परेशान थीं। उसी सिलसिले में साइबर क्राइम ब्रांच में रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए वह हल्द्वानी आई थीं। रिपोर्ट दर्ज करवाते-करवाते दोपहर के लगभग दो बज चुके थे।
अचानक उन्होंने मुझसे पूछा— “क्या तुमने मीडिया विभाग का ऑफिस देखा है? यहीं कहीं था।” मैंने पूछा—“क्या काम है?” वह बोलीं—“अरे! एक दिन उनका फोन आया था कि मैं आपसे मिलना चाहता हूँ। जैसे ही समय मिलेगा, आऊँगा। हम हल्द्वानी आए हैं तो चलो, हम ही मिलकर आ जाते हैं।” मैंने कहा—“ठीक है, पहले आप फोन करके पूछ लीजिए कि वह ऑफिस में हैं या कहीं बाहर।” आशा जी ने अपना फोन निकाला। नंबर खोजने लगीं। “याद नहीं आ रहा कि किस नाम से सेव है… कुछ ‘जोशी’ करके हैं, पर नाम याद नहीं आ रहा।” मैंने कहा—“लाइए, मैं देखती हूँ।” मैंने दो-चार नाम पढ़े और जैसे ही मेरे मुँह से निकला— “गिरिजा शंकर जोशी…” आशा जी के चेहरे पर तुरंत पहचान की चमक आई। “हाँ! यही नाम है।” उन्होंने झट से फोन लगाया।उधर से फोन उठा। परिचय हुआ। आशा जी ने पूछा—“आपका ऑफिस कहाँ है? मैं हल्द्वानी आई हूँ, आपसे मिलना था।”
उधर से बड़ी आत्मीयता और उत्साह भरी आवाज आई— “अभी तो मैं जरूरी काम से ऑफिस से बाहर हूँ। आने में एक घंटा लगेगा। अगर आप इंतजार कर सकती हैं तो ऑफिस आ जाइए। वहीं आराम से बैठिए।” आशा जी ने सहजता से कहा—“ठीक है।” हमें कहाँ पता था कि हम जिस व्यक्ति से मिलने जा रहे हैं, उससे मिलने के लिए समय का वह एक घंटा हमारे जीवन की स्मृतियों में हमेशा के लिए दर्ज होने वाला है।
अपने कुछ छोटे-मोटे काम निपटाकर हम उनके बताए पते पर पहुँच गए। कुछ देर इंतजार करने के बाद गिरिजा शंकर जोशी जी वहाँ पहुँचे। आशा जी को देखते ही उनके चेहरे पर ऐसी खुशी छा गई जैसे कोई अपना बहुत दिनों बाद सामने आया हो। उन्होंने झुककर उनके चरण स्पर्श किए और बड़े अपनत्व से पूछा— “हल्द्वानी कोई काम था?” आशा जी ने अपनी साइबर क्राइम से जुड़ी समस्या बताई और फिर मेरा परिचय करवाया। उन्होंने मेरी ओर देखा और पूछा— “आप कहाँ रहती हैं?” मैंने कहा—“बिठौरिया नंबर एक।”
वह तुरंत बोले— “अरे! मैं भी तो वहीं रहता हूँ।” बात आगे बढ़ी। “मूल निवासी कहाँ से हैं?” “पिथौरागढ़।” “पिथौरागढ़ में कहाँ?” मैंने कहा—“मोड़ी-खोलेगाँव।” उनके चेहरे पर फिर एक आत्मीय मुस्कान आई। “अरे, मैं गया हूँ वहाँ। बहुत साल पिथौरागढ़ में रहा हूँ।” फिर जैसे बातों का कोई सिरा हाथ लग गया हो, उन्होंने अपने परिवार की बातें शुरू कर दीं। अपनी पत्नी के बारे में बड़े प्रेम और गर्व से बताया— “मैं आपको उनसे मिलवाऊँगा। वह आपसे मिलकर बहुत खुश होंगी।” उनकी बातों में अपने परिवार के प्रति प्रेम था, लोगों के प्रति सम्मान था और सबसे बढ़कर एक ऐसी सहजता थी जो किसी पद या प्रतिष्ठा की दीवार को हमारे बीच आने ही नहीं दे रही थी। फिर साहित्य की बात चली। उन्होंने आशा जी से कहा— “मैं लालकुआँ आऊँगा।”
आशा जी ने कहा— “हाँ, अगले हफ्ते आइए। कुछ और मेहमान भी आने वाले हैं। एक काव्य गोष्ठी करते हैं।” वह बड़े उत्साह से बोले— “रविवार को करिएगा। मैं पक्का आऊँगा। पत्नी को भी लेकर आऊँगा। वह बहुत खुश होगी।” उस क्षण उनके चेहरे पर जो उत्साह था, वह आज भी आँखों के सामने है। उन्होंने अपने बच्चों और परिवार का परिचय कराया। फिर बड़े उत्साह से कुछ पत्रकारों से हमें मिलवाया। आशा जी की समस्या का जिक्र किया। उनकी समस्या को एक पत्रकार ने रिकॉर्ड भी किया।बातों का सिलसिला चलता रहा… एक घंटा कब दो घंटे में बदल गया, पता ही नहीं चला। शाम के छह बज चुके थे। मुझे लग रहा था जैसे वह अभी और बातें करना चाहते हैं। जैसे हमारे बीच औपचारिक परिचय की कोई दीवार बची ही नहीं थी। जाते-जाते मैंने कहा— “सर, अब जब भी हम कोई साहित्यिक कार्यक्रम करेंगे, आप जरूर आइएगा।” वह मुस्कुराए और बोले— “हाँ, जरूर। मुझे बहुत खुशी होगी।” हमने विदा ली। बाहर निकलते हुए आशा जी ने कहा— “व्यवहार से बड़े ही सभ्य और आदर-सत्कार करने वाले लग रहे हैं।” मैंने कहा— “हाँ। आपने पहले बताया होता तो हम कुछ किताबें भी साथ ले आते, उन्हें भेंट कर देते।”
वह बोलीं— “अचानक ही ध्यान आया था। कोई बात नहीं। अगले हफ्ते काव्य गोष्ठी में ही भेंट कर देंगे।” अगला हफ्ता… यह दो शब्द कितने सहज थे उस शाम। हमें क्या पता था कि जिंदगी हमारी इस छोटी-सी योजना पर एक ऐसी पूर्णविराम की रेखा खींच चुकी है, जिसका हमें कोई अंदाजा तक नहीं था। मैं भी लौटते हुए यही सोच रही थी— इतना बड़ा अधिकारी होकर भी कितनी सहजता से मिले! कितनी आत्मीयता से बात की! कितने उत्साह से साहित्यिक कार्यक्रम में आने की बात कही! उस दिन की मुलाकात मेरे मन में बस एक अच्छी मुलाकात की तरह रह गई। फिर बीत गए कुछ दिन। और आज… उस मुलाकात को मात्र तेरह दिन हुए हैं। शाम के लगभग साढ़े सात बजे आशा जी का फोन आया। आवाज में घबराहट थी— “ललिता, सुनो! अरे, वो जो गिरिजा शंकर जी थे न, जिनसे हम मिलने गए थे… मैं सुन रही हूँ कि वह नहीं रहे।” एक पल को मुझे लगा जैसे मैंने ठीक से सुना ही नहीं। मैंने पूछा— “आपको किसने बताया?” “दामोदर देवांशु जी ने फेसबुक पर डाला है।” “कैसे हुआ?” “शायद हार्ट अटैक आया है…” बस… उसके बाद कुछ क्षणों के लिए जैसे मेरे भीतर सब कुछ ठहर गया। मैं रास्ते में थी। अपने काम से लौट रही थी। अचानक मन में एक अजीब-सी घबराहट भर गई। और फिर…मेरी आँखों के सामने उसी दिन का पूरा दृश्य घूमने लगा।आशा जी को देखकर उनका खिल उठता चेहरा… उनका चरण स्पर्श करना… “आप कहाँ रहती हैं?” “बिठौरिया नंबर एक।” “अरे! मैं भी तो वहीं रहता हूँ…” फिर पिथौरागढ़ की बातें… मोड़ी-खोलेगाँव… अपनी पत्नी का जिक्र… काव्य गोष्ठी में आने का उत्साह… “रविवार को करिएगा, मैं पक्का आऊँगा… पत्नी को भी लेकर आऊँगा।” और फिर जाते-जाते उनका वह वाक्य— “हाँ, जरूर… मुझे बहुत खुशी होगी।” कितना अजीब है जीवन! कभी-कभी हम किसी व्यक्ति से मिलते हैं और सोचते हैं—
फिर मिलेंगे। लेकिन नियति कहीं चुपचाप खड़ी मुस्कुरा रही होती है और जानती है कि वह “फिर” कभी आएगा ही नहीं। आज पूरा सोशल मीडिया गिरिजा शंकर जोशी जी के शोक संदेशों से भरा हुआ है। हर तरफ एक ही बात—
“मात्र 50 वर्ष की आयु में गिरिजा शंकर जी का निधन।” मात्र पचास वर्ष… यह उम्र लिखते हुए भी मन मानने को तैयार नहीं होता। अभी तो इतने सपने बाकी थे। अभी तो इतने कार्य बांकी थे। लेकिन जिंदगी शायद “अभी” और “बाद में” के बीच ही कहीं खत्म हो जाती है। हम कल के लिए कितनी चीजें बचाकर रखते हैं—
किसी से मिलने का समय,
किसी को फोन करने की बात,
किसी को किताब देने की इच्छा,
किसी से मन की बात कहने की चाह…
और हमें लगता रहता है कि समय हमारे पास बहुत है। पर सच तो यह है कि समय हमारे पास नहीं होता, हम समय के पास होते हैं। और वह कब हमें छोड़कर आगे निकल जाए, कोई नहीं जानता। उस दिन हमने उनसे कहा था— “फिर मिलेंगे।” आज सोचती हूँ… शायद जीवन में सबसे अधूरा वाक्य यही है—
“फिर मिलेंगे।” क्योंकि अगली मुलाकात का अधिकार हमारे हाथ में नहीं है। हमारे हाथ में केवल आज है। इसलिए जो कहना है, आज कह दीजिए।
जो प्रेम है, आज बाँट दीजिए।
जिसे सम्मान देना है, आज दे दीजिए।
जिससे मिलना है, आज मिल लीजिए।
और जो पल सामने है, उसे कल के भरोसे मत छोड़िए।
क्योंकि— कुछ मुलाकातें दोबारा होने के लिए नहीं होतीं,
वे सिर्फ इसलिए होती हैं कि जाते-जाते कोई व्यक्ति
हमारी स्मृतियों में हमेशा के लिए रह जाए। 31 अगस्त को हुई वह मुलाकात भी शायद ऐसी ही थी। तब हमें लगा था— हम उनसे फिर मिलेंगे। आज समझ आया— वह मुलाकात आख़िरी थी। और शायद जीवन का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि
जिस पल को हम साधारण समझकर जीते हैं,
कभी-कभी वही हमारा सबसे अनमोल अंतिम पल बन चुका होता है। गिरिजा शंकर जोशी जी को विनम्र श्रद्धांजलि। आपसे हुई वह छोटी-सी मुलाकात अब छोटी नहीं रही। वह हमारी स्मृतियों में एक ऐसा पन्ना बन गई है, जिसे जब भी पलटेंगे, आँखों के सामने आपका वही मुस्कुराता चेहरा होगा और मन चुपचाप कहेगा— “सर… आपने कहा था—फिर मिलेंगे।
काश, जिंदगी ने उस ‘फिर’ के लिए थोड़ा-सा समय और दिया होता…”
ॐ शांति।
@ललिता…
हल्द्वानी उत्तराखंड































