देहरादून । कहते हैं – ‘जैसा राजा, वैसी प्रजा’। पर उत्तराखंड में कहावत उल्टी पड़ गई है – जैसा राजा, वैसे अफसर। धामी सरकार में कुछेक नौकरशाह ऐसे भी हैं, जिनकी वर्दी पर खाकी नहीं, बल्कि सीधे-सीधे संघ की मोहर और भाजपा का ठप्पा लगा है। सूत्रों की मानें तो ये अधिकारी फाइलों पर नहीं, बल्कि भाजपा के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। दिन में सरकार के नौकर और शाम को सत्ता के लिए ‘अपना उल्लू सीधा’ करने में जुटे हैं। ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव सिर्फ नेताओं का नहीं, इन ‘काली भेड़ों’ का भी लिटमस टेस्ट होगा। पहाड़ में चर्चा गर्म है कि ये वही चेहरे हैं, जो चुनाव के दौरान ‘पर्दे के पीछे से खेल’ करते हैं। कभी ट्रांसफर-पोस्टिंग के नाम पर, तो कभी योजनाओं को लटकाने-भटकाने के नाम पर विपक्षी दलों का गला घोंटा जाता है। इसीलिए अब विपक्षी खेमे से जल्द ही आवाज उठ सकती है कि ऐसे चिन्हित नौकरशाहों को चुनाव के दौरान राज्य से बाहर भेजा जाए, या उनके हर सरकारी काम पर रोक लगाई जाए। ताकि चुनाव निष्पक्ष हो और ‘बाड़ ही खेत को न खा जाए’ वाली कहावत चरितार्थ न हो। राजनीतिक जानकारों का साफ मानना है – अगर भाजपा के अलावा सभी दलों ने समय रहते निर्वाचन आयोग के सामने यह मांग पुरजोर तरीके से नहीं रखी, तो 2027 में निष्पक्ष चुनाव का सपना, सपना ही रह जाएगा। क्योंकि जब रेफरी ही एक टीम का हो जाए, तो मैच का अंजाम क्या होगा, यह पहाड़ का बच्चा-बच्चा जानता है।































