Home उत्तराखंड ‘पारस’ : संघर्ष की आँच में तपकर मनुष्य बनने की कथा

‘पारस’ : संघर्ष की आँच में तपकर मनुष्य बनने की कथा

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वरिष्ठ साहित्यकार आशा शैली का उपन्यास ‘पारस’ केवल एक व्यक्ति के जीवन की कथा नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक परिवेश का भी दस्तावेज है जिसमें अभाव, पारिवारिक विघटन, गाँव का सामुदायिक जीवन, शिक्षा, श्रम, रिश्तों की गर्माहट, पलायन और मनुष्य की जिजीविषा एक-दूसरे से जुड़ते हैं। आशा शैली के साहित्य में पर्वतीय जीवन, मानवीय रिश्तों और सकारात्मक जीवन-दृष्टि की उपस्थिति पर स्वयं लेखिका ने भी बल दिया है।

  1. भावनात्मक दृष्टि से

उपन्यास का सबसे मजबूत पक्ष इसकी मानवीय संवेदना है।कथा का आरंभ ही पारस की माँ जानकी की मृत्यु से होता है। डेढ़ वर्ष के बच्चे का माँ को खोजते हुए रोना और पिता सोमनाथ का पत्नी-वियोग में टूट जाना पाठक के भीतर करुणा पैदा करता है। यहाँ लेखिका मृत्यु को केवल एक घटना के रूप में नहीं रखतीं, बल्कि यह दिखाती हैं कि एक मृत्यु पूरे परिवार की संरचना को किस प्रकार बदल देती है। पारस का बचपन माँ के अभाव, पिता की विवशता और परिस्थितियों की कठोरता के बीच गुजरता है। यही अभाव आगे चलकर उसके व्यक्तित्व को गढ़ता है। इस दृष्टि से उपन्यास में करुणा केवल आँसू नहीं है; वह चरित्र-निर्माण की शक्ति बन जाती है। मुझे विशेष रूप से यह बात प्रभावशाली लगी कि पारस के जीवन में आने वाले लोग केवल अच्छे या बुरे पात्र बनकर नहीं रह जाते। कुछ लोग सहारा देते हैं, कुछ परिस्थितियों का लाभ उठाते हैं और कुछ अपने छोटे-छोटे व्यवहारों से उसके जीवन में परिवर्तन लाते हैं। यही मानवीय विविधता उपन्यास को भावुक होने के बावजूद जीवन के करीब रखती है। अंतिम पृष्ठों में देसराज और पारस का संवाद इस भावभूमि को चरम तक पहुँचाता है। देसराज पारस को अपने जीवन की उपलब्धि की तरह देखता है और अंत में उसे ‘हीरा’ पाने जैसा अनुभव करता है। यह भाव उपन्यास के शीर्षक ‘पारस’ को एक गहरा अर्थ देता है। भावनात्मक प्रभाव की दृष्टि से उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि पाठक पारस के जीवन को केवल पढ़ता नहीं, उसके साथ चलता है।

  1. सामाजिक दृष्टि से

‘पारस’ का सामाजिक पक्ष बहुत महत्वपूर्ण है। उपन्यास में गाँव केवल कथा की पृष्ठभूमि नहीं है; वह स्वयं एक सामाजिक चरित्र की तरह उपस्थित है। जन्म, मृत्यु, बीमारी, विवाह, संकट—हर परिस्थिति में गाँव के लोग एक-दूसरे के जीवन में उपस्थित दिखाई देते हैं। इसके साथ ही लेखिका ने ग्रामीण जीवन का दूसरा पक्ष भी दिखाया है—अभाव और असमान अवसर। पारस के जीवन में शिक्षा और रोजी-रोटी दोनों संघर्ष के विषय बनते हैं। वह जिस सामाजिक वातावरण से निकलता है, वहाँ प्रतिभा के साथ-साथ परिस्थितियाँ भी व्यक्ति के भविष्य का निर्धारण करती हैं। विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि उपन्यास केवल गरीबी का चित्रण करके रुक नहीं जाता। वह यह प्रश्न भी उठाता है कि अभावग्रस्त व्यक्ति अपने जीवन को किस प्रकार बदल सकता है? यहाँ शिक्षा का महत्व सामने आता है। पारस का विकास इस बात का संकेत है कि परिस्थितियाँ मनुष्य को रोक सकती हैं, लेकिन यदि उसे अवसर और सही मार्गदर्शन मिल जाए तो वह अपनी नियति को बदल सकता है।

पलायन और विस्थापन

उपन्यास का एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदर्भ विभाजन और विस्थापन की स्मृति भी है। अंतिम हिस्सों में पाकिस्तान में रह गए पिता का उल्लेख, लौटने की इच्छा, जमीन और नौकरी को लेकर बातचीत—ये प्रसंग व्यक्ति के निजी जीवन को इतिहास की बड़ी त्रासदी से जोड़ते हैं। अंतिम पृष्ठों में देसराज के संवादों में यह अतीत स्पष्ट रूप से उभरता है। इस कारण ‘पारस’ को केवल ग्रामीण उपन्यास कहना पर्याप्त नहीं होगा। इसमें व्यक्ति, परिवार, गाँव और विस्थापन के बड़े सामाजिक प्रश्न एक-दूसरे में घुले हुए हैं।

  1. साहित्यिक दृष्टि से

साहित्यिक दृष्टि से उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कथात्मक सहजता है। आशा शैली कहानी को बहुत जटिल शिल्प में नहीं बाँधतीं। कथा अपेक्षाकृत सीधी गति से आगे बढ़ती है। घटनाएँ एक-दूसरे से जुड़ती हुई पारस के जीवन की यात्रा को सामने लाती हैं। यहाँ लेखिका की कहानीकार वाली दक्षता दिखाई देती है। छोटे-छोटे प्रसंगों के माध्यम से चरित्र खुलते हैं। पारस स्वयं उपन्यास का केंद्रीय चरित्र है, लेकिन उसके आसपास देसराज, सोमनाथ, सुमित्रा, कुंदन तथा अन्य पात्र उसकी मानसिक और सामाजिक यात्रा को आकार देते हैं। विशेष रूप से देसराज का चरित्र मुझे उपन्यास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण लगता है। वह केवल सहयोगी पात्र नहीं, बल्कि पारस के जीवन में एक प्रकार का मार्गदर्शक और संरक्षक मूल्य लेकर आता है। इसी प्रकार सुमित्रा का चरित्र भी केवल घरेलू उपस्थिति नहीं है। उसके माध्यम से स्त्री के श्रम, त्याग, घरेलू जिम्मेदारियों और मानवीय लगाव का पक्ष सामने आता है।

शीर्षक की सार्थकता

‘पारस’ शीर्षक अत्यंत अर्थपूर्ण है। भारतीय सांस्कृतिक कल्पना में पारस वह है जिसके स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है। उपन्यास में पारस स्वयं परिस्थितियों की कठोरता से गुजरता हुआ एक ऐसा व्यक्तित्व बनता है जिसकी असली कीमत अंत में पहचानी जाती है और जब अंतिम हिस्से में देसराज उसे ‘हीरा’ पाने की अनुभूति से जोड़ता है, तो शीर्षक का अर्थ और गहरा हो जाता है—मनुष्य का मूल्य उसकी परिस्थितियों से नहीं, उसके संघर्ष और उसके व्यक्तित्व से तय होता है।

  1. शब्द-शैली की दृष्टि से

आशा शैली की भाषा इस उपन्यास की बड़ी ताकत है। भाषा सरल, सहज, संवादप्रधान और जनजीवन के निकट है। इसमें साहित्यिक आडंबर बहुत कम है। पात्र जिस सामाजिक परिवेश से आते हैं, उनकी बातचीत भी उसी के अनुरूप रखी गई है।इससे उपन्यास पढ़ते समय ऐसा लगता है कि कोई व्यक्ति हमें कहानी सुना रहा है। विशेष रूप से संवादों में भाषा की स्वाभाविकता दिखाई देती है। ग्रामीण परिवेश, पारिवारिक संबोधन और बोलचाल के शब्द कथा को कृत्रिम होने से बचाते हैं। लेखिका जहाँ आवश्यक होता है, वहाँ प्रकृति और वातावरण का चित्र भी खींचती हैं; लेकिन उनका उद्देश्य केवल सौंदर्य-वर्णन नहीं बल्कि परिस्थिति और मनःस्थिति को जोड़ना है। यह शैली उनकी व्यापक साहित्यिक पहचान से भी मेल खाती है। उपलब्ध साक्षात्कार में आशा शैली स्वयं अपनी लेखकीय दृष्टि को संवेदना, सकारात्मकता और मानवीय मूल्यों से जोड़ती हैं तथा साहित्य को ‘सबका हित’ करने वाला मानती हैं।

एक साहित्यिक सीमा

समीक्षा को केवल प्रशंसा तक सीमित रखना उचित नहीं होगा। कुछ स्थानों पर कथा घटनाओं को बताने की ओर अधिक झुकती है, जबकि वही प्रसंग यदि कुछ अधिक मनोवैज्ञानिक गहराई या सूक्ष्म अंतर्दृष्टि के साथ प्रस्तुत होते तो उपन्यास की साहित्यिक ऊँचाई और बढ़ सकती थी। कहीं-कहीं संवाद और घटनाएँ इतनी स्पष्टता से समझाई गई हैं कि पाठक को स्वयं अर्थ ग्रहण करने की गुंजाइश थोड़ी कम मिलती है। अर्थात् लेखिका की कथाकारिता बहुत मजबूत है, लेकिन कुछ जगह ‘दिखाने’ की अपेक्षा ‘बताने’ का आग्रह अधिक दिखाई देता है।फिर भी यह कमी उपन्यास की पठनीयता को बहुत प्रभावित नहीं करती।

  1. सबसे महत्वपूर्ण बात—‘पारस’ आखिर कहना क्या चाहता है?

मेरी दृष्टि में उपन्यास का केंद्रीय कथ्य है—

मनुष्य को परिस्थितियाँ नहीं, उसके संघर्ष, संस्कार और संबंध मिलकर गढ़ते हैं। पारस के जीवन में माँ का अभाव है, आर्थिक कठिनाइयाँ हैं, पारिवारिक संघर्ष हैं, सामाजिक परिस्थितियाँ हैं; लेकिन उसके जीवन में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो उसे टूटने नहीं देते। यही कारण है कि उपन्यास निराशा में समाप्त नहीं होता।अंत में देसराज की आँखों में पारस के लिए गर्व और स्नेह दिखाई देता है। उसका विश्वास है कि उसने एक ‘हीरा’ पाया है और वह चाहता है कि उसका बच्चा हमेशा सुखी रहे। यह अंत उपन्यास की मूल जीवन-दृष्टि को स्पष्ट कर देता है।

निष्कर्ष

‘पारस’ एक ऐसी मानवीय कथा है जिसमें एक व्यक्ति के जीवन-संघर्ष के माध्यम से परिवार, गाँव, गरीबी, शिक्षा, श्रम, संबंध, विस्थापन और मानवीय मूल्यों की कहानी कही गई है। आशा शैली की विशेषता यह है कि वे बड़े सामाजिक विमर्शों को किसी भारी-भरकम वैचारिक भाषा में नहीं, बल्कि एक सामान्य मनुष्य के जीवन की छोटी-बड़ी घटनाओं के माध्यम से सामने रखती हैं। यही इस उपन्यास को सहज और प्रभावी बनाता है। मेरी दृष्टि में ‘पारस’ का वास्तविक सौंदर्य उसके कथानक से अधिक उसके मानवीय ताप में है। यह उपन्यास पाठक को यह सोचने के लिए विवश करता है कि किसी व्यक्ति की सफलता के पीछे केवल उसकी अपनी मेहनत नहीं होती—कई अनदेखे हाथ, रिश्ते, त्याग और परिस्थितियाँ भी उसके व्यक्तित्व को गढ़ती हैं और शायद इसी अर्थ में ‘पारस’ केवल उपन्यास का नायक नहीं, बल्कि एक प्रतीक है—उस मनुष्य का जो जीवन की कठोर चट्टानों पर चलते हुए भी अपने भीतर की चमक बचाए रखता है।

समीक्षक
ललिता कापड़ी
हल्द्वानी उत्तराखंड
7895572889
lalitakapri01@gmail.com