कैंची धाम से कैश धाम तक का सफर
बड़ा विचित्र समय है। कभी जून के मेले में गिने-चुने भक्तों वाला कैंची धाम आज सेल्फी पॉइंट बन गया है, और अब उसी शांति के पुजारी नीम करौली बाबा के नाम पर फिल्म ‘हनुमान अंश’ करोड़ों से अरबों की दौड़ में है। भक्ति हिट है तो फिल्म तो बननी ही थी।
बाबा से भगवान तक का प्रमोशन
बाबा जी का जीवन जितना सरल था, मार्केटिंग उतनी ही जटिल हो गई है। जो आदमी खुद जंगल की शांति में ध्यान करने आया था, आज उसी के नाम पर शोर है। 2013-14 में उनके साथ रहे पुराने लोग बताते थे कि बाबा सीधे-साधे साधु थे, ध्यान में लीन रहते थे। इस घाटी की शांति उन्हें भा गई तो रुक गए। ध्यान से सिद्धि मिली, तो लोगों का दुख हरने लगे। बस। लेकिन श्रद्धा को जब मार्केट मिल जाए तो साधु सीधे भगवान बना दिया जाता है। आज आलम ये है कि घर के मंदिर में शिव के साथ बाबा की फोटो समकक्ष लगी है। हमारे दादा-परदादा कहते थे, ईश्वर और संत की भूमिका अलग रखो। संत को पूजो, पर ईश्वर मत बनाओ। पर कौन सुने? आस्था में भी अब लेवल अपग्रेड चाहिए।
हनुमान अंश का लॉजिक
फिल्म का सबसे बड़ा पंच ही सबसे बड़ा पंचर है। हनुमान जी आजीवन ब्रह्मचारी, अजर-अमर। और उनका ‘अंश’ अवतरित हो गया? किस ग्रंथ में? रामायण में, पुराणों में, कहीं तो दिखाओ।बाबा को हनुमान जी का परम भक्त कहना समझ आता है। बाबा का अपना वर्चस्व था, अपनी पहचान थी – वो भविष्य देखकर लोगों को सत्कर्म की राह दिखाते थे। पर उन्हें जबरदस्ती हनुमान का ‘अंश’ घोषित करके आप बाबा की पहचान बढ़ा नहीं रहे, घटा रहे हैं। बाबा को बाबा रहने दो, हनुमान जी को हनुमान जी। दोनों का कद इतना बड़ा है कि किसी को किसी के अंश की बैसाखी की जरूरत नहीं।
कर्म का सिनेमा
फिल्म भेड़चाल की सबसे बड़ी मिसाल है। किसी ने कहा अंश है, तो सबने मान लिया। कर्म की बात बाबा सिखाते थे, फिल्म वाले भूल गए। 10 लोग IAS की परीक्षा देते हैं, 5 इंटरव्यू तक पहुंचते हैं, 1 बनता है। वो 1 का कर्म है। फिर वही IAS अगर अहंकार में आकर भ्रष्टाचार करे और 5 साल बाद डिमोट हो जाए, तो वो भी उसी का कर्म है। अच्छा कर्म, अच्छा फल। बुरा कर्म, बुरा फल। बाबा यही तो कहते थे। पर फिल्म ‘हनुमान अंश’ कर्म नहीं, चमत्कार बेच रही है। क्योंकि चमत्कार बिकता है, कर्म नहीं। सच तो ये है – अरबों कमा रही फिल्म हनुमान जी के ब्रह्मचर्य पर सवाल उठा रही है और बाबा जी की सादगी पर करंसी का पर्दा डाल रही है। भक्ति रहे, अंधभक्ति और बॉक्स ऑफिस भक्ति से बचें।
भक्ति हिट है, मार्केटिंग फेल है!
जब 15 करोड़ की फिल्म को OTT वाले “बहुत ज्यादा संस्कारी है” कहकर रिजेक्ट कर दें, तो समझो किस्मत बदलने वाली है।नेताओं ने सोचा – जनता महंगाई, सड़क, नौकरी पर सवाल पूछेगी, इससे अच्छा है भक्ति दिखा दो। धामी जी ने फिल्म देखी, टैक्स फ्री किया। योगी जी ने निर्देशक से मिलकर फोटो खिंचवाई। फिल्म का प्रमोशन हो गया, सरकार का भी। फिल्म पहले दिन 10 लाख कमाती है, तीसरे हफ्ते 10 करोड़। इसे कहते हैं – राजनेताओं की PR एजेंसी सबसे तगड़ी है।































