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नल से जहर, फाइलों में कहर

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हाईकोर्ट की फटकार के बाद जागी धामी सरकार, कहावत चरितार्थ – नौ दिन चले अढ़ाई कोस

पानी में जहर, कुर्सी से बाहर – कुमाऊं के छह इंजीनियरों पर गिरी गाज

नैनीताल /देहरादून । कहते हैं सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने से क्या फायदा, पर धामी सरकार ने वही कर दिखाया। ज्योलीकोट में दूषित पेयजल से जनता की आंतें ऐंठती रहीं, तब तक साहबों की नींद नहीं खुली, और जब नैनीताल हाईकोर्ट ने खुद संज्ञान लेकर सरकार को आईना दिखाया, तब जाकर अफसरों की कुर्सी हिली नहीं, सीधे गई। जिला प्रशासन की रिपोर्ट को आधार बनाकर जल संस्थान हल्द्वानी के प्रभारी अधीक्षण अभियंता, नैनीताल जल संस्थान के सहायक अभियंता और अपर सहायक अभियंता समेत पेयजल निगम भीमताल के अधिशासी अभियंता, प्रभारी सहायक अभियंता और कनिष्ठ अभियंता – कुल छह इंजीनियरों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। वहीं नैनीताल जल संस्थान के अधिशासी अभियंता को ‘आगे से कान पकड़ने’ की चेतावनी देकर छोड़ दिया गया है।

हाईकोर्ट करे पहरेदारी, सरकार करे नेतागिरी?

मजे की बात यह है कि जिस मामले में हाईकोर्ट स्वयं पहरेदार बनकर बैठा है, उसी मामले में सरकार दो हफ्ते बाद ‘सख्त संदेश’ का पोस्टर चिपका रही है। जनता पूछ रही है कि जब नलों से जहर आ रहा था, तब यह सख्ती कहां तेल लेने गई थी? हाईकोर्ट को स्वत: संज्ञान लेना पड़ा, यह अपने आप में सरकार की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान है। कहावत है – राम-राम जपना, पराया माल अपना – जनहित की बातें खूब, पर जमीन पर काम हाईकोर्ट के हंटर के बाद। उधर सरकार का अपना राग है – जनस्वास्थ्य से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं, जनहित सर्वोपरि है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि लापरवाह बख्शे नहीं जाएंगे।

सूत्रों की मानें तो यह वही पुरानी कहानी है – ऊँट के मुंह में जीरा। छह जूनियर इंजीनियरों को बलि का बकरा बनाकर क्या सिस्टम की सड़ांध छुप जाएगी? असली सवाल तो आज भी नल में ही अटका है – कि ज्योलीकोट में पानी दूषित हुआ कैसे? निगरानी तंत्र सोया क्यों रहा? और क्या निलंबन के इस राजनीतिक स्टंट से भविष्य में पानी साफ हो जाएगा? फिलहाल तो एक दिन पहले NEET फर्जीवाड़े में 8 प्रमाणपत्र रद्द और अब जल विभाग में 6 कुर्सियां खाली – सरकार एक्टिव मोड का बोर्ड टांगने में लगी है। पर जनता सब जानती है, साहब – हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और।

बहरहाल, तस्वीर का दूसरा पहलू और भी स्याह है। प्रदेश में सैकड़ों सरकारी स्कूलों पर ताला लटक गया है, सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था खुद वेंटिलेटर पर है और आईसीयू में सांसे गिन रही है। उधर राज्य की सरकारी सम्पत्तियों की खुलेआम बंदरबांट चल रही है, स्थाई राजधानी का सवाल आज भी आ बैल मुझे मार की तरह अधर में लटका है और भ्रष्टाचार अपने चरम पर नंगा नाच कर रहा है। इन असली मुद्दों पर धामी सरकार का कोई जिम्मेदार पहल दूर-दूर तक नजर नहीं आता।

खैर, मुद्दे हजार हैं और बातें बेशुमार, पर समाधान के नाम पर रह गया है तो सिर्फ 1905 वाला सोशल मीडिया वाला मुख्यमंत्री का वही पुराना राजनीतिक स्टंट – ऊंची दुकान, फीके पकवान। बहरहाल कितने ही मामले ऐसे हैं जो 1905 हेल्पलाइन पर दर्ज होने के बाद भी कागजों में दौड़ते-दौड़ते दम तोड़ देते हैं और समाधान के लिए अंत में हाईकोर्ट नैनीताल की चौखट पर पहुंचते हैं। यह अपने आप में धामी सरकार के लिए अपने गिरेबान में झांकने का वक्त है। अब समय आ गया है कि सरकार थोथा चना बाजे घना की नीति छोड़कर अपनी ही कार्यशैली का आत्म-मंथन करे, वरना यह 1905 भी सिर्फ एक जुमला नंबर बनकर रह जाएगा।