Home विशेष संस्मरण : समुचित विकास की चिंता

संस्मरण : समुचित विकास की चिंता

45

शशि कुड़ियाल”चंद्रभा”

देहरादून। बात कुछ समय पहले की है मेरी छोटी बहन की बेटी ने घुटनों से नया नया चलना सीखा था लेकिन वह चलने की कोशिश बहुत ही कम करती थी जिसकी वजह से मेरी बहन को उसके समुचित विकास न होने की चिंता सताती रहती थी। एक दिन मैंने देखा कि उसकी बिटिया घुटनों से चलकर एक खिलौने तक पहुंचने का प्रयास कर रही थी लेकिन जैसे ही वह पास पहुंचने वाली होती तो उसकी मां यानि मेरी बहन उस खिलौने को थोड़ा दूर रख देती। बच्ची थोड़ा सा रोती और मां द्वारा पुचकारने पर फिर खिलौने को पकड़ने जाती और मां उस खिलौने को फिर से थोड़ा आगे खिसका देती और बच्ची दुबारा थोड़ी देर रोती और फिर खिलौना पकड़ने के लिए चलने लगती। मुझे यह सब देखकर अपनी बहन पर बहुत गुस्सा आया और मैंने उसे डांटते हुए कहा कि मां होने के बावजूद भी उसे अपनी बच्ची पर दया नहीं आ रही और न ही उसे उसकी फिक्र है। मेरी बहन ने कहा ” बस दीदी दो मिनट” और इस तरह वह क्रम थोड़ी देर और उसी तरह चलता रहा और अंत में बच्ची जब खूब चल ली तो मेरी बहन ने अब उसे खिलौने तक पहुंचने दिया और तब उसे एक नही बल्कि प्यार से दो तीन और खिलौने भी दिए, उसे बहुत प्यार किया और फिर दूध भी पिलाया।
बच्ची को प्यार से दूध पिलाते हुए उसने मुझे जवाब दिया कि “मां हूं इसीलिए इतनी फिक्र है दीदी क्योंकि अगर आज यह कोशिश नही करेगी तो चलेगी कैसे, इसकी टांगे कमज़ोर हैं तो वो मजबूत कैसे बनेंगी।” उसकी बात सुनकर मुझे सहसा एहसास हुआ कि ईश्वर की लीला भी तो कुछ ऐसी ही होती है वह परम पिता सदैव हमारा भला चाहते हैं और हमें हमारे कंफर्ट जोन से बाहर निकालने के लिए कभी कभी हमारे साथ सख्ती भी करते हैं और हमें लगता है कि इतने प्रयास के बाद भी हम अपनी मंज़िल को प्राप्त नही कर पा रहे और ईश्वर को कोसने लगते हैं। किन्तु वास्तव में उस वक्त ईश्वर हमसे और अधिक प्रयास की अपेक्षा रखते हैं और उस कसौटी पर खरा उतरने पर उम्मीद से अधिक प्रदान करते हैं।
इसलिए जब भी लगे कि मंज़िल नही मिल पा रही तो हमें समझना चाहिए कि ईश्वर हमें हमारी चाहत से कुछ और बेहतर देना चाहते हैं। छोटी होने के बावजूद आज अनायास ही मेरी बहन ने मुझे जीवन का एक बहुत बड़ा सबक सिखा दिया था। और मैंने भी उसे थैंक यू बोलते हुए गले से लगा लिया।