शशि कुड़ियाल
देहरादून। शहर के प्रसिद्ध देवी मंदिर में भक्तों का रेला उमड़ा था। चारों ओर ‘जय माता दी’ के जयकारे गूंज रहे थे। उसी भीड़ में शामिल था रमेश।
भक्ति का चोला ओढ़े रमेश की नजरें विग्रह पर नहीं, बल्कि भीड़ में खड़ी असहाय स्त्रियों पर थीं। कभी कोहनी मारना, तो कभी भीड़ का फायदा उठाकर किसी को गलत तरीके से छूना उसकी पुरानी फितरत थी। मंदिर की पवित्रता और मां के दरबार का खौफ भी उसके भीतर की गंदगी को नहीं रोक पाया। उसे लग रहा था कि भीड़ के शोर में उसकी यह नीच हरकत कोई नहीं देख रहा, पर उसकी अपनी ही बेटी ईशा, जो सहेलियों के साथ वहीं थी, पिता का यह वीभत्स चेहरा देख स्तब्ध रह गई थी।
शाम को घर लौटते ही रमेश ने पत्नी सुमित्रा पर धौंस जमाई, “सुनो! आज महाअष्टमी है। रसोई में शुद्धता का पूरा ध्यान रखना। लहसुन-प्याज की गंध भी आई तो मेरा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। मुझे पूर्ण सात्विक भोजन चाहिए, वरना अनर्थ हो जाएगा!”
सुमित्रा मौन थी, पर ईशा ने आगे बढ़कर कहा, “मां आज का खाना मैं परोसूंगी।”
रात को जब रमेश भोजन की थाली के सामने बैठा, तो सुगंध सूंघते ही उसके तन-बदन में आग लग गई। दाल में लहसुन का तड़का था और थाली के एक कोने में प्याज के बड़े-बड़े छल्ले सजे थे।
रमेश चिल्लाया, “ईशा! यह क्या बदतमीजी है? तुझे पता नहीं आज अष्टमी है? इस तामसी भोजन से मेरा धर्म और मेरा व्रत दोनों अपवित्र हो गए! तेरी हिम्मत कैसे हुई मुझे यह परोसने की?”
ईशा शांत थी, पर उसकी आंखों में ज्वालामुखी दहक रहा था। उसने पिता की आंखों में आंखे डालकर कहा, “अपवित्रता खाने में नहीं है पापा, अपवित्रता तो उस स्पर्श में थी जो आज सुबह मंदिर की भीड़ में आपने अनगिनत स्त्रियों को दिया। लहसुन-प्याज खाने से धर्म भ्रष्ट होने का डर है, पर पराई स्त्रियों की मर्यादा को लहू-लुहान करते समय आपका धर्म कहां सोया था?”
रमेश के चेहरे का रंग उड़ गया। वह हकलाते हुए बोला, “ये… ये तू क्या बकवास कर रही है?”
“बकवास नहीं पापा, सच कह रही हूं,” ईशा की आवाज और तीखी हो गई। “जिस हाथ ने आज देवी के दरबार में उसी के अंश का अपमान किया, वो हाथ सात्विक भोजन छूने के लायक भी नहीं हैं। आप पेट की शुद्धि की बात करते हैं, जबकि आपकी आत्मा सड़ चुकी है। यह प्याज-लहसुन तो सिर्फ स्वाद बदलेंगे, आपकी नीयत ने तो पूरे परिवार का सम्मान ही बदल दिया है।
एक तरफ आप देवी मां के नौ दिन के उपवास रखते हैं और दूसरी तरफ़ उसी देवी के स्वरूपों को अपनी वासना और कुदृष्टि से अपवित्र करते हैं , अगर उपवास करना है तो अपने कुत्सित विचार और कर्मों का करो l आप भले ही उपवास न रखते किंतु अगर आपकी सोच सात्विक होती तो मुझे आप पर गर्व होता लेकिन आपके इस ढोंग और आपकी कुदृष्टि पर मुझे आपको पापा कहने में भी शर्म आ रही है !”
रमेश की आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उसने कांपते हाथों से थाली दूर धकेल दी।
कमरे का वातावरण बदल गया था। उस पल, रमेश को लगा कि उसके सामने उसकी बेटी ईशा नहीं, बल्कि साक्षात् दुर्गा खड़ी है। उसकी तीखी आंखों में वही तेज था, जो महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा में होता है।
ईशा के वे शब्द केवल शब्द नहीं थे, वे एक दिव्य शस्त्र की तरह थे, जिन्होंने आज महाअष्टमी के पावन दिन पर रमेश के भीतर वर्षों से पनप रहे हवस, वासना और छल-कपट रूपी शुंभ-निशुंभ और महिषासुर का संहार कर दिया था।
रमेश फूट-फूटकर रोने लगा और भारी आवाज में बोला, “आज मेरा व्रत सच में टूट गया ईशा… पर भोजन से नहीं, बल्कि उस आईने से जो तूने मुझे दिखाया है। मैं अपनी सात्विकता का ढोंग कर रहा था, जबकि असली दानव तो मेरे भीतर था। तूने आज मुझे बचा लिया बेटी…”
उस रात रमेश ने भोजन नहीं किया, लेकिन पहली बार उसने अपने भीतर की गंदगी को साफ करने का संकल्प लिया। वह समझ गया था कि नारी का सम्मान ही सबसे बड़ी सात्विकता है और असली शुद्धि पेट की या शरीर की नहीं, मन की होती है। और देवी मां मन की शुद्धि से प्रसन्न होती हैं l



























