Home उत्तराखंड संगठन के दरबार में नतमस्तक हुई पूरी सरकार

संगठन के दरबार में नतमस्तक हुई पूरी सरकार

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पोस्टरों पर सुशासन, मंच पर चरण-वंदना – यही है डबल इंजन का असली मॉडल, धामी शासनकाल में जनता फाइलों में ही अटकी रही

हल्द्वानी। आखिरकार भाजपा की वो घड़ी आ ही गई जिसका इंतजार था। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के हल्द्वानी आगमन पर उत्तराखंड की पूरी सरकार ने संगठन के दरबार में जिस तरह हाजिरी लगाई, उसने लोकतंत्र की सारी किताबें फेल कर दीं।मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खुद अगुवाई करते हुए दौड़े-दौड़े पहुंचे। पीछे-पीछे पूरी कैबिनेट, विधायक और वो पूरा प्रशासन जो जनता के काम पर कुंभकरण बना रहता है। आज फुर्ती ऐसी थी जैसे अगली पोस्टिंग का ऑर्डर इसी स्वागत लाइन में बंट रहा हो।

वैसे तो मुख्यमंत्री को कुर्सी तक विधायक लाए और विधायकों को जनता, पर ये सब किताबी बातें हैं। असली सत्ता कहाँ है, ये आज हल्द्वानी के मंच ने चीख-चीख कर बता दिया। जनता तो बाद में आती है, अगर समय बचा तो। धामी जी का हिसाब भी पक्का है। खटीमा ने जो दिया, वो ब्याज समेत पूरे प्रदेश से वसूला जा रहा है। अरबों का मीडिया मैनेजमेंट, करोड़ों का अपना प्रचार और जनता के सिर पर कर्ज का एवरेस्ट। यही है नया विकास मॉडल – जनता कर्ज में, सरकार प्रचार में।

गरीबों और जरूरतमंदों के नाम पर आई मदद का रास्ता भी बड़ा सीधा है, सीधा संगठन के चहेतों की तिजोरी में। सरकार बड़ी दयालु है, बस दया का पात्र जनता नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन, बेलगाम नौकरशाही – ये सब इस सरकार के लिए आउटडेटेड मुद्दे हैं। विकास का नया पैमाना है – मंदिर के नाम पर वोट, UGC बिल पर हंगामा, पहले हिंदू का मंत्र और अब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य का नया जातीय कैलकुलेटर।

विभागों का हाल मत पूछिए। भ्रष्टाचार इस कदर बेलगाम है कि विभाग अब जनता के पत्रों का जवाब देना भी अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। जब मुखिया ही भ्रष्ट से भ्रष्टतम अफसरों को सिर पर बिठाए रखेगा तो नीचे गंदगी फैलेगी ही। और जाहिर है, इस गंदगी से कहीं न कहीं सत्ता की जेब भी गर्म हो रही होगी, तभी तो कोई कार्रवाई नहीं। आज का नजारा देखने लायक था। जनता के चुने हुए प्रतिनिधि प्रोटोकॉल ताक पर रखकर स्वागत पंक्ति में खड़े थे। लाइन में लगे थे कि नंबर आए तो मुस्कुराहट के साथ एक सेल्फी हो जाए।

कार्यक्रम का नाम था भाजपा कार्यकारिणी विस्तार और 2027 में सत्ता वापसी का मंथन। लेकिन मौके का फायदा उठाकर फिर खड़गे की रैली पर जातिगत भेदभाव का पुराना राग छेड़ दिया गया। मंच के पीछे बड़े-बड़े पोस्टर लगे थे – सेवा, सुशासन और विकास। वो नारे उन महापुरुषों के थे जिन्हें भाजपा अपना आदर्श बताती है। पोस्टर पर नारे चमक रहे थे और मंच पर उन्हीं नारों की धज्जियां उड़ रही थी।

इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा दृश्य यही था…

कुछ पूर्व मंत्री और विधायक जी अकेले अकेले ही टहलते नजर आ रहे थे, और जिनके इर्द-गिर्द कभी मेला लगता था, आज वहाँ एक अदना-सा कार्यकर्ता भी फटकने को तैयार नहीं था। साफ है – जब तक पद है, पावर है, तब तक कार्यकर्ता मधुमक्खी की तरह भिनभिनायेंगे, जय-जयकार करेंगे और जैसे ही पद गया, पावर कटा… तो मधुमक्खी तो दूर, छत्ता तक गायब! संस्कारों की बड़ी-बड़ी बात करने वालों के संस्कार भी उस भीड़ के साथ ही विदा हो गए लगते हैं। यही है सत्ता का असली प्रसाद!

सार एक ही निकला – इस सरकार में पहले संगठन, फिर सत्ता और अगर इन दोनों की सेवा से समय बच गया तो अंत में कहीं जनता।