हल्द्वानी। शहर में शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठे विवाद के बीच इंस्पिरेशन स्कूल के प्रबंधक दीपक बल्यूटिया मजबूती के साथ सामने आए हैं। उन्होंने न सिर्फ अपने विद्यालय पर लगे आरोपों को सिरे से खारिज किया, बल्कि पूरे मामले को पारदर्शिता और नीतिगत खामियों के नजरिए से देखने की अपील की है।
इस पूरे मामले को लेकर दीपक बल्यूटिया का स्पष्ट कहना है कि स्कूल ने कभी भी अभिभावकों को किसी विशेष दुकान या विक्रेता से किताबें खरीदने के लिए बाध्य नहीं किया। उन्होंने कहा कि पुस्तकों की सूची पूरी तरह नियमों और न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप तैयार की गई। सत्र शुरू होने से पहले ही इसे सार्वजनिक रूप से वेबसाइट पर उपलब्ध कराया गया, जिसका एकमात्र उद्देश्य सुविधा और पारदर्शिता था, न कि किसी तरह का दबाव। उन्होंने अपने पक्ष को साफ करते हुए कहा कि
अगर जानकारी पहले से देना गलत है, तो पारदर्शिता की परिभाषा क्या है? किताबों की कीमतों के अंतर पर सवाल उठाते हुए श्री बल्यूटिया ने कहा कि एन.सी.ई.आर.टी. की किताबों की अलग-अलग राज्यों में अलग कीमतें हैं।
दिल्ली में वही किताब करीब 65 रुपए में उपलब्ध है, जबकि उत्तराखंड में वही किताब अधिक कीमत पर मिलती है। उन्होंने सवाल उठाया कि एक ही किताब की कीमत में इतना अंतर क्यों है, और इसका सीधा असर अभिभावकों की जेब पर पड़ रहा है।श्री बल्यूटिया ने एस.सी.ई.आर.टी. और एन.सी.ई.आर.टी. की नीतियों की अस्पष्टता का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सरकारी विद्यालयों और आरटीई के तहत 25 प्रतिशत छात्रों के लिए पुस्तकों की आपूर्ति की अनुमति तो है, लेकिन निजी विद्यालयों के लिए इन पुस्तकों की खुले बाजार में बिक्री को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। इसी कारण कई बार निजी स्कूल भी अनदेखे दबाव में काम करते हैं। उन्होंने सरकार से जल्द से जल्द फीस विनियमन अधिनियम लागू करने की मांग की। साथ ही पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराने की भी बात कही। बहरहाल, दीपक बल्यूटिया का यह पक्ष शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त खामियों की ओर इशारा तो करता ही है। साथ ही यहां यह सवाल खड़ा होता है कि क्या वास्तव में शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी है? या फिर असली समस्या कहीं और है और निशाना कोई और बन रहा है?


























