Home उत्तराखंड अगर अधिकारी सुलझे होते तो शिकायतें उलझी न होतीं ?

अगर अधिकारी सुलझे होते तो शिकायतें उलझी न होतीं ?

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आईएएस और पीसीएस और… : फाइलों के सिपाही, सिस्टम के दरबारी

उत्तराखंड में एक कहावत सौ फीसदी चरितार्थ हो रही है – “कागज के घोड़े दौड़ाना और काम के घोड़े को अस्तबल में बांध देना।” ज्योलिकोट में यही हुआ। सीवर का पानी पेयजल में घुला, घर-घर लोग बीमार पड़े, दो लोगों की मौत हो गई, हाईकोर्ट ने फटकारा, जांच कमेटी बनी और फिर वही पुराना खेल – जवाबदेही फाइलों में दफन। यह सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, पूरे सरकारी सिस्टम के फेल होने का पोस्टमार्टम है और यह कहानी सिर्फ ज्योलिकोट की नहीं, हर विभाग की है।

शिकायत की यात्रा – फाइलों की भूलभुलैया

आम आदमी एक शिकायत लिखता है। पहला पहरा बाबू का – साहब मीटिंग में हैं। जैसे-तैसे फाइल बड़े साहब तक पहुंच भी गई तो साहब दस्तखत कर उसे ठंडे बस्ते में डाल देते हैं। फिर शिकायतकर्ता किसी स्रोत-सिफारिश से फाइल हिलवाता है तो जवाब मिलता है – “दो दिन में देखते हैं।” ये दो दिन कभी पूरे नहीं होते। तीसरा पहरा है ट्रांसफर-पोस्टिंग का। जब तक फाइल हिलती है, साहब का तबादला हो जाता है और नया साहब फिर जीरो से शुरू करता है। मतलब सीधा फॉर्मूला है तारीख पर तारीख, फाइल पर फाइल और काम का टोटा। आपके शिकायती पत्र की कीमत सिर्फ अलमारी का पेट भरने तक रह जाती है। ज्योलिकोट इसका सबसे बड़ा सबूत है। दो विभागों की लड़ाई में जनता पिस गई – “दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर रोटी खा गया।” पेयजल निगम और जल संस्थान ने दशकों पुरानी लीक लाइन से सप्लाई जारी रखी। स्वास्थ्य विभाग के PHC में पैरासिटामोल के भरोसे महामारी रोकने का दावा रहा, 70% मरीज आज भी निजी अस्पतालों में लुट रहे हैं। लोक निर्माण और पंचायती राज ने सड़क खोद कर पाइप तोड़ दी, नाली साफ नहीं की। जिला प्रशासन ने 4 दिन बाद होश में आकर टैंकर भेजे, तब तक संक्रमण हर घर में था और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तो कागजों में ही पानी जांचता रहा।

बीमारी पानी में नहीं, कुर्सी में है

असली बीमारी मेवा और कुर्सी का गठजोड़ है। अफसर आज सुलझा हुआ नहीं, उलझा हुआ है। उसे जनता की फाइल से ज्यादा अपनी ACR और मनचाही पोस्टिंग की चिंता है। भले ही कोई कितनी मेहनत से IAS-PCS बनकर आया हो, सिस्टम उसे अंत में एक ही मंत्र सिखा देता है – “जिसकी लाठी उसकी भैंस, जिसकी सिफारिश उसकी कुर्सी।” और “बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय।” जब पोस्टिंग ही नेता के रहमो-करम से मिलेगी तो काम जनता का नहीं, आका का होगा। इसीलिए देहरादून, नैनीताल, मसूरी की मलाईदार कुर्सियों पर चिपकने की होड़ है। जब गलत को गलत कहने वाले ईमानदार पर ही राजनीतिक दबाव बनेगा, तो फिर गलत को गलत कौन कहेगा? नतीजा है – “अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने देय।” सरकारी दफ्तरों में शिकायतों का अंबार है, पर निस्तारण सिर्फ खानापूर्ति है। आज जरूरत एक सख्त प्रोटोकॉल की है – हर शिकायत का 15 दिन में टाइम-बाउंड जवाब, देरी पर सीधे अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई। हाईकोर्ट को हर बार डंडा न चलाना पड़े। ज्योलिकोट के मृतकों को मुआवजा नहीं, जवाब चाहिए। किस जेई ने लाइन पास की, किस डॉक्टर ने ड्यूटी से मुंह मोड़ा, किस अफसर ने फाइल दबाई? अगर इस बार भी सिर्फ नोटिस देकर मामला निपटाया गया, तो अगला ज्योलिकोट तैयार खड़ा है। क्योंकि सच यही है –

अगर अधिकारी सुलझे होते, तो शिकायतें उलझी न होतीं।