कर्ज, पलायन और बेरोजगारी के बीच उत्तराखंड को धामी सरकार ने दिया ‘न्याय का नया महल’ ?
भाजपा सरकार जनता के मुद्दे छोड़, इमारतों में ढूंढ रही विकास
हल्द्वानी। उत्तराखंड में जहां आज भी गांव बिजली, पानी, डॉक्टर और शिक्षक के लिए तरस रहे हैं, जहां हर साल पहाड़ से मैदान की ओर पलायन का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है, और जहां 2000 में अलग राज्य बनने के 26 साल बाद भी “स्थाई राजधानी” फाइलों में ही दौड़ रही है… वहीं सरकार ने जनता को एक नई सौगात देने का फैसला किया है।

हाईकोर्ट अब नैनीताल से हल्द्वानी शिफ्ट होगा और वो भी करोड़ों-अरबों की लागत से नए सिरे से।
सरकार का तर्क: “विकास”
सरकार कहती है कि नैनीताल में जगह कम है, जाम लगता है, विस्तार नहीं हो सकता। इसलिए हल्द्वानी में हाईकोर्ट का नया भव्य भवन बनेगा। कागजों पर यह “न्याय तक आसान पहुंच” है।
जनता का सवाल: “पहले पेट, फिर पैरवी”
लेकिन सवाल वही पुराना है जिसे सरकार सुनना नहीं चाहती:
- कर्ज: राज्य पहले से ही हजारों करोड़ के कर्ज में है। ब्याज चुकाते-चुकाते बजट का बड़ा हिस्सा निकल जाता है।
- बुनियाद: शिक्षा में शिक्षकों की कमी, स्वास्थ्य में डॉक्टरों की कमी, और रोजगार के नाम पर पलायन।
- प्राथमिकता: जिस राज्य को आज तक स्थाई राजधानी नहीं मिली, वहां “स्थाई न्यायालय” के लिए अरबों खर्च करना कितना जरूरी है?
स्थानीय वकील और सामाजिक कार्यकर्ता पूछ रहे हैं – “क्या हाईकोर्ट की नई इमारत से गांव में स्कूल खुल जाएंगे? क्या नए अस्पताल बन जाएंगे? क्या पहाड़ से उतर कर शहर आ रहे युवाओं को यहीं रोजगार मिलेगा?”
“डबल इंजन” का डबल स्टैंडर्ड?
सवाल यहीं खत्म नहीं होता। सरकार पर आरोप है कि राज्य के काम भी अब राज्य के बाहर जा रहे हैं। 2027 में हरिद्वार में होने वाले कुंभ की तैयारियों के बड़े-बड़े ठेके गुजरात की कंपनियों को दे दिए गए। जबकि स्थानीय ठेकेदार, मजदूर और इंजीनियर यही कहते रह गए कि “पहाड़ का काम पहाड़ वाला ही बेहतर जानता है।” धामी सरकार के कार्यकाल में ऐसे कई उदाहरण गिनाए जा रहे हैं जहां “स्थानीय पहले” का नारा फाइलों तक सीमित रह गया और टेंडर “बाहरी पहले” को मिल गए।
अब आगे क्या?
सरकार के लिए यह हाईकोर्ट “विकास का प्रतीक” है। विपक्ष के लिए “कर्ज का नया अध्याय”। और जनता के लिए… एक और सवाल।
क्योंकि हकीकत यही है, जिस प्रदेश में रोजगार के संसाधन होने के बावजूद युवा पलायन कर रहा हो, जहां हर साल बजट का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में चला जाता हो, वहां अरबों की नई इमारत बनाने से पहले यह तय करना होगा कि “न्याय” सिर्फ अदालत की चारदीवारी में होता है या गांव की सड़क, स्कूल और अस्पताल में भी।
फिलहाल फैसला सरकार का है और हिसाब… 2027 के चुनाव में जनता का।































