सत्ता के लिए ‘परिवार तोड़ो’ फॉर्मूला
हल्द्वानी। भाजपा ने आखिरकार मान ही लिया कि बाहर विरोधियों को हराना मुश्किल है, तो क्यों न घर के अंदर ही कुश्ती करा दी जाए। उत्तराखंड में हरक सिंह रावत को घेरने के लिए उनकी बहू अनुकृति गुसाईं को सामने खड़ा करके पार्टी ने साबित कर दिया है कि उसके लिए अब कोई चुनावी मुद्दा नहीं, सिर्फ चेहरा चाहिए, चाहे वो एक ही परिवार का क्यों न हो।भाजपा परिवार में ही अन्तःकलह कराना शुरू कर चुकी है। ऐसे में जाहिर सी बात है कि भाजपा समाज के प्रति कितनी मानसिक रूप से परिपक्व है। उसे सिर्फ सत्ता चाहिए, फिर चाहे उसके लिए बहू और ससुर, जो एक तरह से पिता-पुत्री जैसे पवित्र रिश्ते में हैं, को ही एक-दूसरे का विरोधी क्यों न बनाना पड़े।
जो पार्टी पूरे देश को ‘संस्कार और परिवार’ का पाठ पढ़ाती थी, आज उसी की राजनीति संस्कारों को दांव पर लगाकर खेली जा रही है। ये कैसी राष्ट्रवाद और संस्कृति की रक्षा है जहां एक घर की दहलीज पर ही दो झंडे गाड़ दिए गए? सोचिए, जिस मंच पर ससुर अपनी बहू को आशीर्वाद देकर आगे बढ़ाता है, उसी मंच पर अब एक-दूसरे के खिलाफ पर्चे फाड़े जाएंगे। जिस रिश्ते में पिता अपनी बेटी समान बहू को घर की इज्जत मानता है, वहां अब माइक पर एक-दूसरे की इज्जत उतारी जाएगी।
भाजपा के लिए यह मास्टरस्ट्रोक होगा, लेकिन समाज के लिए यह कितना बड़ा झटका है? क्या यही भाजपा का ‘सबका साथ, सबका विकास’ है – कि एक ही घर के दो लोगों को साथ लाने के बजाय उन्हें एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दो? आज ससुर-बहू को लड़ाया है, इससे पहले भाई-भाई को लड़ाया था और ऐसा ही रहा तो भविष्य में बाप-बेटे को भी टिकट देकर आपस में लड़वाया जाएगा? सत्ता की इस भूख ने बता दिया है कि भाजपा के लिए रिश्ते, संस्कार और सामाजिक मर्यादा से बड़ा सिर्फ और सिर्फ कुर्सी और पैसा ही सबकुछ है।































