ललिता कापड़ी, हल्द्वानी।
हर वृक्ष मौसम की मार नहीं सहता, और हर रिश्ता समय की परीक्षा नहीं…
किसी वृक्ष की असली ताकत उसकी ऊँचाई में नहीं, उसकी जड़ों की गहराई में होती है।
जो वृक्ष धरती के भीतर जितना गहरा उतरता है, वह आँधियों के सामने उतना ही दृढ़ खड़ा रहता है। मौसम बदलते हैं, हवाएँ अपना रुख बदलती हैं, बारिश कभी मूसलाधार होती है तो कभी सूखा पड़ता है—लेकिन गहरी जड़ों वाला वृक्ष अपनी जगह से डगमगाता नहीं।
“ऊँचाई दुनिया को दिखाई देती है,
पर मजबूती हमेशा जड़ों में छिपी होती है।”
वटवृक्ष, बरगद और पीपल केवल वृक्ष नहीं, प्रकृति की उस सीख के जीवंत उदाहरण हैं कि जिसका आधार मजबूत हो, उसे परिस्थितियाँ आसानी से नहीं हिला सकतीं।
कुछ ऐसा ही रिश्तों के साथ भी होता है।
रिश्ते भी पौधों की तरह होते हैं। शुरुआत में वे नाज़ुक होते हैं—एक छोटी-सी गलतफहमी, एक कठोर शब्द या थोड़ी-सी उपेक्षा उन्हें मुरझा सकती है। लेकिन समय के साथ यदि उन्हें ईमानदारी, वफ़ादारी, प्रेम, संयम और सम्मान की खाद मिलती रहे, तो उनकी जड़ें गहरी होती जाती हैं।
फिर रिश्ते केवल साथ रहने का नाम नहीं रहते, वे एक-दूसरे की खामोशियों को समझने का हुनर बन जाते हैं।
“रिश्ते शब्दों से नहीं,
व्यवहार की निरंतरता से गहरे होते हैं।”
लेकिन यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात है—सिर्फ खाद अच्छी होना ही पर्याप्त नहीं।
यह भी देखना पड़ता है कि हम खाद किस पौधे पर डाल रहे हैं।
क्योंकि हर पौधा बरगद नहीं होता।
आप किसी पौधे को कितना भी पानी दें, कितनी भी अच्छी खाद दें, कितनी भी धूप दें—यदि उसकी प्रकृति ही ऐसी है कि वह गहराई तक जड़ें नहीं फैलाता, तो पहली तेज़ आँधी में उसके अस्तित्व का सच सामने आ जाएगा।
ठीक यही रिश्तों में भी होता है।
हम किसी को कितना भी प्रेम दे सकते हैं, उसके लिए कितना भी त्याग कर सकते हैं, कितनी भी ईमानदारी निभा सकते हैं; लेकिन यदि सामने वाला व्यक्ति विश्वास को समझता ही नहीं, वफ़ादारी को महत्व नहीं देता, सम्मान को रिश्ते की बुनियाद नहीं मानता, तो हमारी सारी कोशिशें धीरे-धीरे व्यर्थ होने लगती हैं।
“हर रिश्ते को बचाना प्रेम नहीं होता;
कभी-कभी यह पहचान लेना भी प्रेम है कि
जिस पौधे में जड़ें ही नहीं, उसे कितना भी सींचो—वह वृक्ष नहीं बनेगा।”
रिश्तों की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि उनमें दो लोग एक-दूसरे को बदलने के लिए नहीं, एक-दूसरे को समझने के लिए होते हैं।
जहाँ गलती हो, वहाँ अहंकार नहीं—संवाद हो।
जहाँ दूरी हो, वहाँ संदेह नहीं—विश्वास हो।
जहाँ कठिन समय हो, वहाँ शिकायत नहीं—साथ हो।
और जहाँ प्रेम हो, वहाँ अधिकार से पहले सम्मान हो।
क्योंकि प्रेम केवल किसी को अपना कहने का नाम नहीं है।
प्रेम तो तब है, जब उस अपने के मन, उसकी गरिमा, उसकी भावनाओं और उसकी स्वतंत्रता की भी उतनी ही कद्र की जाए।
“प्रेम रिश्ते को जन्म दे सकता है,
लेकिन सम्मान ही उसे उम्र देता है।”
कई रिश्ते इसलिए नहीं टूटते कि उनमें प्रेम कम था; वे इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि उनमें विश्वास की मिट्टी कम और अपेक्षाओं का बोझ अधिक था।
हम अक्सर चाहते हैं कि सामने वाला हमें समझे, लेकिन स्वयं उसे समझने का धैर्य नहीं रखते।
हम चाहते हैं कि वह हमारी भावनाओं की कद्र करे, लेकिन उसकी भावनाओं को अपनी सुविधानुसार तौलते रहते हैं।
हम चाहते हैं कि वह हमारे लिए ईमानदार रहे, लेकिन अपनी सुविधा के लिए सच छिपाने से नहीं हिचकते।
रिश्ता दो लोगों की साझी जिम्मेदारी है।
एक व्यक्ति लगातार जड़ें सींचता रहे और दूसरा बार-बार मिट्टी ही उखाड़ता रहे, तो कोई भी वृक्ष कब तक खड़ा रहेगा?
“एकतरफ़ा निभाया गया रिश्ता,
रिश्ता नहीं—धीरे-धीरे थकता हुआ इंतज़ार होता है।”
इसलिए रिश्तों में प्रेम दीजिए, मगर अपनी समझ के साथ।
विश्वास कीजिए, मगर आँखें बंद करके नहीं।
समर्पण कीजिए, मगर अपना आत्मसम्मान खोकर नहीं।
और सबसे महत्वपूर्ण—पहचानिए कि सामने वाला कौन-सा पौधा है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि आप बरगद बनने की उम्मीद में किसी बेल को सदियों से सींच रहे हैं?
कुछ लोग आपकी भावनाओं को जड़ें देते हैं।
कुछ केवल आपकी भावनाओं पर चढ़कर ऊँचे होते हैं।
कुछ आपकी छाया में पनपते हैं।
और कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें आपकी छाया की आदत तो पड़ जाती है, लेकिन आपकी जड़ों की कोई परवाह नहीं होती।
इसलिए हर रिश्ते को बचाने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसमें बचने की क्षमता भी है या नहीं।
रिश्ते छोड़ना हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन कभी-कभी किसी ऐसे रिश्ते से बाहर निकलना, जिसमें केवल आप ही प्रयास कर रहे हों, स्वयं के प्रति भी एक तरह की ईमानदारी होती है।
क्योंकि जीवन बहुत छोटा है—हर मौसम किसी ऐसे पौधे को सींचने में नहीं बिताया जा सकता, जो खिलने का इरादा ही न रखता हो।
“रिश्तों में खाद डालते रहिए,
मगर यह देखना मत भूलिए—
जिस पौधे को आप सींच रहे हैं,
उसमें जड़ें हैं भी या सिर्फ़ काँटे।”
अंततः रिश्तों की गहराई इस बात से तय नहीं होती कि हमने किसी के लिए कितना किया।
वह इस बात से तय होती है कि दोनों ने मिलकर एक-दूसरे के लिए कितना सुरक्षित, सम्मानजनक और सच्चा स्थान बनाया।
क्योंकि मजबूत रिश्ते वे नहीं होते जिनमें कभी आँधी नहीं आती।
मजबूत रिश्ते वे होते हैं जिनकी जड़ें आँधी आने के बाद भी एक-दूसरे को थामे रहती हैं।
और शायद रिश्तों का सबसे बड़ा सत्य यही है—
«“प्रेम फूल है, विश्वास उसकी जड़ है,
सम्मान उसकी मिट्टी है,
संयम उसका पानी है और वफ़ादारी वह धूप,
जिसके बिना कोई रिश्ता लंबे समय तक हरा नहीं रह सकता।”»
इसलिए किसी के जीवन में वृक्ष बनकर जाइए—
सिर्फ़ छाया देने के लिए नहीं,
बल्कि ऐसा विश्वास देने के लिए
कि मौसम चाहे जितने बदलें,
यह रिश्ता अपनी जगह से नहीं हिलेगा।































