– 110 दिन बाद जागी सरकार, मुख्यमंत्री के आश्वासन पर टिका प्रशिक्षितों का भविष्य
देहरादून। सच ही कहा गया है – “बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया और उससे भी बड़ी कुर्सी!” राजनीति में स्थायी कुछ नहीं होता, सिवाय स्वार्थ के। चाणक्य ने कहा था – “राजा के निकट रहने वाले सेवक नहीं, अवसर तलाशते हैं।“ आज यही चरितार्थ हो रहा है। जब तक हाथ में सत्ता की लाठी है, तब तक हर कोई परिक्रमा करता है। कुर्सी गई तो पहचान गई – यही तो राजनीति का शाश्वत सत्य है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत हों या पूर्व मुख्यमंत्री-पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी, यह दृश्य सबने देखा है। एक के इर्द-गिर्द सन्नाटा है क्योंकि सत्ता नहीं, दूसरे के इर्द-गिर्द भीड़ है क्योंकि पार्टी सत्ता में है। “सब मतलब के यार हैं” वाली कहावत यहां अक्षरशः सत्य साबित होती है और इसी आपाधापी में पिस रहा है उत्तराखंड का युवा।

शिक्षा निदेशालय, देहरादून में पिछले 110 दिनों से अनिश्चितकालीन धरना और 95 दिनों से क्रमिक अनशन पर बैठे शारीरिक शिक्षा प्रशिक्षित बेरोजगारों ने आखिरकार आज मुख्य सेवक सदन में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात की। संगठन के प्रदेश अध्यक्ष जगदीश चंद्र पाण्डेय के नेतृत्व में बेरोजगारों ने अपनी पीड़ा रखी। मुख्यमंत्री ने हमेशा की तरह आश्वासन दिया कि मामला जल्द कैबिनेट में लाया जाएगा।
सोचिए, अपने जीवन के सबसे कीमती 110 दिन, साढ़े तीन महीने, इन युवाओं ने सड़कों पर काट दिए। तुलसीदास जी ने कहा था – “समरथ को नहीं दोष गोसाईं” – समर्थ सत्ता और बेलगाम नौकरशाही के आगे इन युवाओं की कौन सुने?
प्रशिक्षितों की 4 जायज मांगें, जो फाइलों में दबी हैं:
1. नई शिक्षा नीति-2020 के तहत प्रदेश के प्रत्येक प्राथमिक से इंटरमीडिएट तक हर विद्यालय में एक शारीरिक शिक्षक की नियुक्ति हो।
2. उच्च प्राथमिक विद्यालयों में नियुक्ति से संबंधित फाइल संख्या 77006 को कैबिनेट से मंजूरी दिलाकर भर्ती शुरू की जाए।
3. राजकीय इंटर कॉलेजों में शारीरिक शिक्षा के व्यायाम प्रवक्ता (Lecturer) के पद सृजित किए जाएं।
4. वर्ष 2006 से नियुक्ति की बाट जोह रहे प्रशिक्षितों को आयु सीमा में छूट दी जाए।
अब सवाल यह है कि क्या धामी सरकार के अंतिम पड़ाव के इन बचे-खुचे तीन महीनों में कुछ ठोस होगा? यूजीसी, भू-कानून, मूल निवास, स्थायी राजधानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन और भ्रष्टाचार जैसे ज्वलंत मुद्दों पर क्या कोई निर्णायक कदम उठेगा, या फिर “कागज के घोड़े दौड़ाकर“ और मीडिया मैनेजमेंट से ही समय काट दिया जाएगा?
कहावत है – “सौ दिन चोर के, एक दिन साध का।” 110 दिन तो इन युवाओं ने तपस्या कर ली। क्या अब साध का दिन आएगा? या फिर यह युवा यूं ही “अपनी ही खेती में मजदूर” बनकर आंदोलनों में अपना स्वर्णिम समय गंवाते रहेंगे और बेलगाम नौकरशाही “अपना उल्लू सीधा” करती रहेगी?फिलहाल गेंद सरकार के पाले में है और युवाओं की नजरें कैबिनेट की फाइल संख्या 77006 पर टिकी हैं।































