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बेरीनाग से मुखेम तक, रक्षक है नाग

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उत्तराखंड: जहाँ आज भी नाग देवता करते हैं क्षेत्र की रक्षा, बेरीनाग से मुखेम तक गूंजती है सर्प पूजा की परंपरा

उत्तराखंड को सिर्फ देवभूमि नहीं, बल्कि “नागभूमि” भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा। प्राचीन काल से यहाँ नागों यानी सर्प देवताओं और नाग वंश का गहरा प्रभाव रहा है। आर्यों के आने से पहले से लेकर आज तक पहाड़ों के जनजीवन, लोक संस्कृति और भूगोल में नागों को “क्षेत्रपाल” यानी क्षेत्र का रक्षक और मालिक देवता मानकर पूजा जाता है।

आर्यों से पहले था नाग वंश का शासन

इतिहासकार मानते हैं कि उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों, खासकर पिथौरागढ़ और बेरीनाग क्षेत्र में आर्यों के आगमन से पहले नाग वंश का शासन था। तभी से यहाँ नागों को केवल देवता ही नहीं, बल्कि धरती के संरक्षक के रूप में देखा जाता है। गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों में आज भी हर गाँव, हर घाटी का अपना नाग देवता है।

कुमाऊं: नागपुरी कहलाता है पिथौरागढ़ का इलाका
कुमाऊं में नाग पूजा का सबसे बड़ा केंद्र उत्तरी क्षेत्र “नागपुरी” माना जाता है।

  • बेरीनाग, पिथौरागढ़: इसका प्राचीन नाम “वेणीनाग” था। कभी यह नागों का प्रमुख ऐतिहासिक केंद्र हुआ करता था। आज भी यहाँ नाग संस्कृति की जड़ें सबसे गहरी हैं।
  • प्रमुख मंदिर: यहाँ काली नाग, धौली नाग, फेणी नाग जिन्हें न्याय का देवता माना जाता है, वासुकी नाग, पिंगल नाग, सुंदर नाग, खरही नाग और अटकुनी नाग के प्रसिद्ध मंदिर स्थापित हैं। मान्यता है कि फेणी नाग सच्चे-झूठे का फैसला करते हैं।
  • मेले: हर साल वैशाख पूर्णिमा और कार्तिक पूर्णिमा पर इन नाग मंदिरों में बड़े मेले लगते हैं। दूर-दूर से श्रद्धालु नाग देवता को रिझाने और आशीर्वाद लेने आते हैं।

गढ़वाल: मुखेम नागराजा हैं सबसे बड़े तीर्थ

गढ़वाल मंडल में नाग पूजा का सबसे प्रसिद्ध केंद्र मुखेम नागराजा टिहरी है। यहाँ देशभर से श्रद्धालु दर्शन को आते हैं।

इसके अलावा:

  • पौड़ी गढ़वाल: डांडा नागराजा और नागदेव मंदिर
  • दशौली: तक्षक नाग की पूजा
  • जौनसार-बावर: वसीनाग मंदिर
  • नागपुर क्षेत्र: वासुकी नाग की परंपरा
  • नागटिब्बा, मसूरी: मसूरी के पास स्थित यह प्रसिद्ध चोटी भी उसी प्राचीन नाग वंश के नाम और प्रभाव से जुड़ी है।

आज भी जीवित है परंपरा

उत्तराखंड में नाग पंचमी ही नहीं, बल्कि फसल, बारिश और गाँव की सुरक्षा के लिए भी नाग देवता को मनाया जाता है। कई जगह आज भी जमीनी विवाद या न्याय के लिए लोग “फेणी नाग” की शपथ लेते हैं।

स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि जब तक पहाड़ों में नाग देवता विराजमान हैं, तब तक यहाँ की प्राकृतिक आपदाएँ और संकट टलते रहेंगे। बेरीनाग से मुखेम तक, काली नाग से वासुकी तक, उत्तराखंड की मिट्टी में नागों की कथाएँ आज भी साँस लेती हैं। यह सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि हजारों साल पुरानी सभ्यता और प्रकृति से जुड़ाव की पहचान है।