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हिंदी — मेरी पहचान

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नेहा खत्री, जयपुर

शब्दों में जिसकी मिठास बसी,
भावों में जिसका संसार,
माँ की लोरी-सी कोमल हिंदी,
दिल के सबसे है पास।
तुलसी की चौपाई में गूँजी,
कबीर के दोहों में ढली,
प्रेमचंद की कलम से निकली,
भारत की तस्वीर बनी।
यह केवल भाषा नहीं है,
यह संस्कृति का मान है,
माटी की खुशबू समेटे,
भारत की पहचान है।
दुःख को शब्द, खुशी को स्वर दे,
मन की हर बात कहती है,
टूटे रिश्तों को जोड़ सके जो,
ऐसी शक्ति रखती है।
नई पीढ़ी जब इसे अपनाए,
तभी इसका सम्मान रहे,
माँ की बोली, देश की भाषा,
सदा यूँ ही महान रहे।
आओ मिलकर प्रण ये लें हम,
हिंदी का गौरव बढ़ाएँगे,
अपनी भाषा, अपनी संस्कृति को
विश्व-पटल तक पहुँचाएँगे।
हिंदी में ही भाव हमारे,
हिंदी में अरमान,
हिंदी से ही जुड़ी हुई है
हम सबकी पहचान।