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अगर किताबें न होती

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शशि कुड़ियाल “चन्द्रभा”

कोई मित्र न होता कोई सखी न होती
न भाव होते कोई न होते छंद
न अलंकारों की हंसी होती
अगर किताबें न होती।

दिल में उठते ज्वार-भाटों को
सुख के उजास और गम की रातों को
कोई अभिव्यक्ति न मिलती
अगर किताबें न होती।

मिलन के हसीन वादों को
विरह के महाविलापों को
कोई मंज़िल न मिलती
अगर किताबें न होती।

ज्ञान के पावन प्रकाश को
हर युग के स्वर्णिम इतिहास को
कोई कलम न लिखती
अगर किताबें न होती।

ऋषि-मुनि के दिव्य ध्यान को
दंभी के मिथ्या अभिमान को
योद्धाओं के शौर्य गान को
वीर-वीरांगना के बलिदान को
कैसे ये दुनिया संजोती
अगर किताबें न होती।

रामायण की कथा महान को
बाइबिल और कुरान को
गीता के उस महा ज्ञान को
सीता की वेदना और निदान को
द्रौपदी के घोर अपमान को
कौन सी वाणी पीड़ा में पिरोती
अगर किताबें न होती।

इन गाथाओं की लंबी सूची को
इस सुंदर सृष्टि समूची को
स्मृतियों की उन ऊंचाइयों को
अनुभवों की गहराइयों को
कौन सी बरखा भावों में भिगोती
अगर किताबें न होती।

शहीदों के पावन योगदान को
नए युग और नव विहान को
भक्ति भाव के रस गान को
प्रेम समर्पण के व्याख्यान को
कौन सी शैली काव्य रस में डुबोती
अगर किताबें न होती।

खोज और आविष्कारों को
तर्क और विचारों को
भविष्य की योजनाओं को
प्रगति की परियोजनाओं को
सहेजने की कौन निभाता चुनौती
अगर किताबें न होती
अगर किताबें न होती !

पुस्तकें महज़ कागजों का पुलिंदा नही अपितु हमारी सभ्यता, भावनाओं और इतिहास का आईना होती हैं। इसलिए पुस्तकों को जीवन में अवश्य अपनाएं।